रूसी क्रांति के कारण Russian Revolution


प्रश्न 1: ‘खूनी रविवार’ (Bloody Sunday) की घटना क्या थी और इसका क्या महत्व है?

उत्तर: 22 जनवरी 1905 को रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में पादरी गैपन के नेतृत्व में मजदूर जार को एक याचिका देने जा रहे थे। जार की सेना ने इन निहत्थे लोगों पर गोलियां चला दीं, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए।
महत्व: इस घटना ने जार के प्रति जनता के विश्वास को पूरी तरह खत्म कर दिया और 1905 की पहली विफल क्रांति का आधार बनी, जिसे 1917 की क्रांति की ‘ड्रेस रिहर्सल’ कहा जाता है।
प्रश्न 2: व्लादिमीर लेनिन की ‘अप्रैल थीसिस’ (April Thesis) क्या थी?
उत्तर: निर्वासन से लौटने के बाद लेनिन ने बोल्शेविकों के सामने तीन मुख्य मांगें रखीं, जिन्हें ‘अप्रैल थीसिस’ कहा जाता है:
1-युद्ध (प्रथम विश्व युद्ध) को तुरंत समाप्त किया जाए।
2-सारी जमीन किसानों के हवाले की जाए।
3-बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया जाए।

प्रश्न 3: व्लादिमीर लेनिन की ‘अप्रैल थीसिस’ का रूसी क्रांति की दिशा बदलने में क्या योगदान था?

उत्तर: निर्वासन से लौटने के बाद अप्रैल 1917 में लेनिन ने जो कार्यक्रम प्रस्तुत किया, उसे ‘अप्रैल थीसिस’ कहा जाता है। इसमें तीन मुख्य मांगें थीं: युद्ध की समाप्ति, भूमि का किसानों को हस्तांतरण और बैंकों का राष्ट्रीयकरण।
उस समय रूस की अस्थायी सरकार युद्ध जारी रखना चाहती थी, जिससे जनता नाराज थी। लेनिन ने “भूमि, शांति और रोटी” का नारा देकर आम जनमानस की नब्ज पकड़ ली। अप्रैल थीसिस ने बोल्शेविक पार्टी को एक स्पष्ट लक्ष्य और दिशा प्रदान की। इसने अस्थायी सरकार की कमजोरियों को उजागर किया और सोवियत के हाथों में पूरी सत्ता देने की मांग को मजबूती दी। इसी वैचारिक स्पष्टता के कारण अक्टूबर 1917 में बोल्शेविक एक सफल क्रांति करने में सक्षम हुए।

प्रश्न 4: रूसी क्रांति के वैश्विक प्रभावों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।

उत्तर: रूसी क्रांति केवल रूस तक सीमित नहीं रही, इसने पूरी दुनिया की राजनीति को प्रभावित किया। सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव ‘सोवियत संघ’ (USSR) के रूप में दुनिया के पहले समाजवादी राज्य का उदय था। इसने पूंजीवाद के विकल्प के रूप में एक नई आर्थिक प्रणाली पेश की।
क्रांति ने एशिया और अफ्रीका के औपनिवेशिक देशों में स्वतंत्रता आंदोलनों को नई ऊर्जा दी, क्योंकि सोवियत संघ ने उपनिवेशवाद का विरोध किया था। भारत में भी भगत सिंह और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेता इससे प्रभावित हुए। वैश्विक स्तर पर मजदूरों के अधिकारों के प्रति चेतना बढ़ी और कई देशों ने ‘कल्याणकारी राज्य’ (Welfare State) की अवधारणा अपनाई। हालांकि, इसने दुनिया को दो वैचारिक गुटों में भी बांट दिया, जो बाद में ‘शीत युद्ध’ का मुख्य कारण बना।

प्रश्न 6: डॉ. सन यात-सेन के ‘तीन सिद्धांतों’ का चीनी क्रांति में महत्व स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: डॉ. सन यात-सेन को ‘आधुनिक चीन का पिता’ कहा जाता है। उन्होंने 1911 की क्रांति का नेतृत्व किया और तीन सिद्धांत दिए: राष्ट्रवाद, लोकतंत्र और जन-आजीविका।
राष्ट्रवाद: इसका अर्थ था मंचू राजवंश के शासन को समाप्त करना और विदेशी साम्राज्यवाद से चीन को मुक्त कराना।
.लोकतंत्र: राजशाही को हटाकर गणतांत्रिक सरकार की स्थापना करना।
.जन-आजीविका: इसका उद्देश्य भूमि सुधार करना और गरीबी दूर करना था।
.इन सिद्धांतों ने बिखरे हुए चीन को एकजुट करने का एक वैचारिक ढांचा प्रदान किया। हालांकि वे अपने जीवनकाल में इन्हें पूरी तरह लागू नहीं कर पाए, लेकिन इन्हीं सिद्धांतों ने आगे चलकर कम्युनिस्ट और राष्ट्रवादी दोनों पार्टियों को प्रेरणा दी।

प्रश्न 7: माओ त्से तुंग ने चीनी क्रांति को रूस से अलग किस प्रकार सफल बनाया?

उत्तर: माओ त्से तुंग ने मार्क्सवाद को चीनी परिस्थितियों के अनुसार ढाला। रूसी क्रांति मुख्य रूप से शहर के औद्योगिक मजदूरों पर आधारित थी, लेकिन माओ ने महसूस किया कि चीन में मजदूर कम और किसान अधिक हैं।
माओ ने ‘किसानों’ को क्रांति का मुख्य आधार बनाया। उन्होंने “गांवों से शहरों को घेरने” की सैन्य रणनीति अपनाई। माओ ने लाल सेना (Red Army) को अनुशासित किया और किसानों के बीच रहकर उनका विश्वास जीता। जहाँ रूस में क्रांति एक बड़े विस्फोट की तरह हुई, वहीं चीन में यह एक लंबा सशस्त्र संघर्ष (Guerrilla Warfare) था। माओ की यह ‘कृषि-आधारित साम्यवाद’ की नीति ही चीन में 1949 की सफलता का मुख्य कारण बनी।

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