पर्यावरणीय समस्याएँ, संरक्षण एवं सतत विकास
Chapter 70: Environmental Problems, Conservation and Sustainable Development
1. पर्यावरण का अर्थ एवं परिभाषा
पर्यावरण उन सभी जैविक और अजैविक घटकों का समुच्चय है, जो पृथ्वी पर रहने वाले जीवों के जीवन, विकास और गतिविधियों को प्रभावित करते हैं। इसमें वायु, जल, मिट्टी, सूर्य का प्रकाश, तापमान, पेड़-पौधे, जीव-जंतु और मनुष्य शामिल हैं।
पर्यावरण के मुख्य घटक दो प्रकार के होते हैं।
(क) जैविक घटक: इनमें मनुष्य, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, सूक्ष्मजीव और अन्य जीवित प्राणी शामिल हैं।
(ख) अजैविक घटक: इनमें वायु, जल, मिट्टी, प्रकाश, तापमान, खनिज और अन्य निर्जीव प्राकृतिक तत्व शामिल हैं।
पर्यावरण के ये सभी घटक एक-दूसरे से जुड़े हैं। किसी एक घटक में गंभीर बदलाव होने पर दूसरे घटकों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
2. पारिस्थितिकी एवं पारिस्थितिकी तंत्र
पारिस्थितिकी (Ecology) जीवों और उनके पर्यावरण के बीच संबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन है। पारिस्थितिकी शब्द का प्रयोग जर्मन जीवविज्ञानी अर्न्स्ट हैकेल ने 1866 में किया था।
पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) एक ऐसी क्रियात्मक इकाई है, जिसमें जीवित समुदाय और उसका निर्जीव पर्यावरण परस्पर क्रिया करते हैं।
पारिस्थितिकी तंत्र के प्रमुख घटक हैं:
- उत्पादक — हरे पौधे, जो प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं।
- उपभोक्ता — वे जीव जो भोजन के लिए अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं।
- अपघटक — बैक्टीरिया और कवक जैसे जीव, जो मृत जैव पदार्थों को सरल पदार्थों में विघटित करते हैं।
- अजैविक घटक — वायु, जल, मिट्टी, प्रकाश और तापमान।
वन, घास के मैदान, तालाब, झील, नदी, समुद्र और मरुस्थल प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के उदाहरण हैं। कृषि क्षेत्र और जलाशय मानव-निर्मित या मानव-प्रभावित पारिस्थितिकी तंत्र के उदाहरण हो सकते हैं।
3. पर्यावरणीय समस्याओं का अर्थ
पर्यावरणीय समस्याएँ वे स्थितियाँ हैं, जिनमें प्राकृतिक संसाधनों, पारिस्थितिकी तंत्र और जीवों के स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। इन समस्याओं के पीछे प्राकृतिक कारण भी हो सकते हैं, लेकिन वर्तमान समय में मानवीय गतिविधियाँ अनेक समस्याओं को बढ़ा रही हैं।
प्रमुख पर्यावरणीय समस्याएँ हैं:
- वायु प्रदूषण
- जल प्रदूषण
- मृदा प्रदूषण एवं मृदा क्षरण
- वनों की कटाई
- जैव विविधता का ह्रास
- वैश्विक तापन
- जलवायु परिवर्तन
- ओजोन परत का क्षय
- मरुस्थलीकरण
- प्लास्टिक एवं ठोस अपशिष्ट
- जल संकट
- समुद्री प्रदूषण
इन समस्याओं का प्रभाव मानव स्वास्थ्य, कृषि, अर्थव्यवस्था, वन्यजीवों और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ता है।
4. वायु प्रदूषण
वायु प्रदूषण वह स्थिति है, जब वायुमंडल में हानिकारक गैसों, धूल, धुएँ या सूक्ष्म कणों की मात्रा इतनी बढ़ जाती है कि जीवों और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगता है।
वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण
- वाहनों से निकलने वाला धुआँ।
- कोयला, पेट्रोलियम और अन्य जीवाश्म ईंधनों का दहन।
- उद्योगों एवं ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाले उत्सर्जन।
- निर्माण कार्यों और सड़कों से उड़ने वाली धूल।
- कचरा और फसल अवशेष जलाना।
- घरेलू ईंधनों का धुआँ।
प्रमुख वायु प्रदूषक
- PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कण।
- सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂)।
- नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx)।
- कार्बन मोनोऑक्साइड (CO)।
- धरातलीय ओजोन।
- कुछ वाष्पशील कार्बनिक यौगिक।
PM2.5 ऐसे कणों को दर्शाता है, जिनका व्यास लगभग 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। ये श्वसन तंत्र में गहराई तक प्रवेश कर सकते हैं।
वायु प्रदूषण के प्रभाव
- अस्थमा और अन्य श्वसन समस्याओं का जोखिम बढ़ना।
- हृदय एवं फेफड़ों के स्वास्थ्य पर प्रभाव।
- दृश्यता में कमी।
- पौधों की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव।
- अम्लीय वर्षा में योगदान, विशेषकर सल्फर और नाइट्रोजन के ऑक्साइड के माध्यम से।
नियंत्रण के उपाय
सार्वजनिक परिवहन, स्वच्छ ईंधन, नवीकरणीय ऊर्जा, उद्योगों में प्रदूषण नियंत्रण उपकरण, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण और कचरा न जलाना वायु प्रदूषण कम करने में मदद कर सकते हैं।
5. जल प्रदूषण
जब नदियों, झीलों, भूजल या समुद्री जल में हानिकारक पदार्थ मिल जाते हैं और पानी की गुणवत्ता प्रभावित होती है, तो इसे जल प्रदूषण कहते हैं।
जल प्रदूषण के प्रमुख कारण
- घरेलू सीवेज का बिना उपचार जल स्रोतों में प्रवाह।
- औद्योगिक अपशिष्ट।
- कृषि में प्रयुक्त उर्वरकों और कीटनाशकों का बहाव।
- प्लास्टिक और अन्य ठोस कचरा।
- तेल रिसाव।
- खनन एवं निर्माण गतिविधियाँ।
जल प्रदूषण के प्रभाव
- पेयजल की गुणवत्ता खराब होना।
- जलजनित रोगों का खतरा बढ़ना।
- जलीय जीवों और वनस्पतियों को नुकसान।
- जल में पोषक तत्वों की अत्यधिक वृद्धि से सुपोषण (Eutrophication) की समस्या।
- ऑक्सीजन की कमी से मछलियों और अन्य जलीय जीवों की मृत्यु।
नियंत्रण के उपाय
सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट का उपचार, जल स्रोतों में कचरा डालने पर रोक, कृषि रसायनों का विवेकपूर्ण उपयोग तथा जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी आवश्यक है।
6. मृदा प्रदूषण एवं मृदा क्षरण
मृदा पृथ्वी की ऊपरी परत है, जिसमें खनिज कण, जैव पदार्थ, जल, वायु और सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं। कृषि, वनस्पति और अनेक स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए मृदा अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मृदा प्रदूषण तब होता है, जब मिट्टी में हानिकारक रसायन या अपशिष्ट जमा हो जाते हैं।
मृदा क्षरण वह प्रक्रिया है, जिसमें मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत हट जाती है या उसकी गुणवत्ता घट जाती है।
प्रमुख कारण
- वनों की कटाई।
- अत्यधिक चराई।
- ढाल वाले क्षेत्रों में अनुचित खेती।
- तेज बहता जल और हवा।
- खनन एवं औद्योगिक गतिविधियाँ।
- उर्वरकों और कीटनाशकों का असंतुलित उपयोग।
संरक्षण के उपाय
- समोच्च जुताई (Contour Ploughing)।
- सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming)।
- वृक्षारोपण और कृषि वानिकी।
- फसल चक्र।
- नियंत्रित चराई।
- ढाल वाले क्षेत्रों में मिट्टी रोकने के उपाय।
7. वनों की कटाई
वनों को बड़े पैमाने पर हटाने या वन क्षेत्र को गैर-वन उपयोग में बदलने की प्रक्रिया को वनों की कटाई (Deforestation) कहते हैं।
प्रमुख कारण
- कृषि भूमि का विस्तार।
- शहरीकरण और सड़क निर्माण।
- खनन एवं औद्योगिक परियोजनाएँ।
- ईंधन और लकड़ी की मांग।
- अनियंत्रित वनाग्नि तथा अवैध कटाई।
प्रभाव
- वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास का विनाश।
- जैव विविधता में कमी।
- मिट्टी का कटाव।
- जल चक्र और स्थानीय जलवायु में बदलाव।
- वन में संचित कार्बन के मुक्त होने से जलवायु परिवर्तन में योगदान।
- कुछ क्षेत्रों में बाढ़ और भूस्खलन का जोखिम बढ़ना।
वन संरक्षण
वनों का सतत प्रबंधन, पुनर्वनीकरण, प्राकृतिक वनों की रक्षा, सामुदायिक भागीदारी और वन्यजीव गलियारों का संरक्षण महत्वपूर्ण उपाय हैं।
पुनर्वनीकरण (Reforestation) का अर्थ उस क्षेत्र में दोबारा वन विकसित करना है, जहाँ पहले वन मौजूद था। वनीकरण (Afforestation) सामान्यतः ऐसे क्षेत्र में वन विकसित करने को कहते हैं, जहाँ पहले लंबे समय से वन नहीं था।
8. जैव विविधता का ह्रास
जैव विविधता (Biodiversity) से आशय जीवों, उनकी प्रजातियों, आनुवंशिक विविधता और पारिस्थितिकी तंत्रों की विविधता से है।
जैव विविधता के तीन प्रमुख स्तर हैं:
- आनुवंशिक विविधता।
- प्रजातीय विविधता।
- पारिस्थितिकी तंत्र की विविधता।
जैव विविधता को खतरे
- प्राकृतिक आवासों का विनाश और विखंडन।
- अवैध शिकार एवं वन्यजीव व्यापार।
- प्रदूषण।
- जलवायु परिवर्तन।
- बाहरी आक्रामक प्रजातियाँ।
- प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन।
संरक्षण के प्रकार
स्वस्थाने संरक्षण (In-situ Conservation): प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रखना। उदाहरण — राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य और जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र।
बहिःस्थाने संरक्षण (Ex-situ Conservation): प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर नियंत्रित परिस्थितियों में संरक्षित करना। उदाहरण — चिड़ियाघर, वनस्पति उद्यान, बीज बैंक और जीन बैंक।
9. वैश्विक तापन एवं जलवायु परिवर्तन
वैश्विक तापन (Global Warming) पृथ्वी की औसत सतही तापमान में दीर्घकालीन वृद्धि को कहते हैं। इसका प्रमुख वर्तमान कारण मानव गतिविधियों से ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा में वृद्धि है।
जलवायु परिवर्तन (Climate Change) तापमान के अलावा वर्षा, पवन, चरम मौसमी घटनाओं और जलवायु की अन्य विशेषताओं में दीर्घकालीन बदलाव को कहते हैं।
प्रमुख ग्रीनहाउस गैसें
- कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂)।
- मीथेन (CH₄)।
- नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O)।
- जलवाष्प।
- कुछ औद्योगिक गैसें, जैसे HFCs।
प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव पृथ्वी को जीवन के अनुकूल तापमान पर बनाए रखने में मदद करता है। समस्या तब बढ़ती है, जब मानवीय गतिविधियों के कारण ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता बढ़ जाती है।
प्रमुख कारण
- कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस का दहन।
- वनों की कटाई।
- कृषि और पशुपालन से होने वाला उत्सर्जन।
- औद्योगिक प्रक्रियाएँ।
- ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र का उत्सर्जन।
प्रभाव
- हिमनदों और बर्फ की चादरों का पिघलना।
- समुद्र के औसत स्तर में वृद्धि।
- ताप लहरों का जोखिम बढ़ना।
- वर्षा के पैटर्न में परिवर्तन।
- कृषि और जल संसाधनों पर दबाव।
- पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता पर प्रभाव।
समाधान
ऊर्जा दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा, सार्वजनिक परिवहन, वनों का संरक्षण, उत्सर्जन में कमी और जलवायु के अनुकूल बुनियादी ढाँचे का विकास आवश्यक है।
10. ओजोन परत का क्षय
ओजोन परत समतापमंडल में स्थित ओजोन गैस की वह परत है, जो सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों के एक बड़े हिस्से को अवशोषित करती है।
कुछ क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) और अन्य ओजोन-क्षयकारी पदार्थ समतापमंडल में पहुँचकर ओजोन अणुओं को नष्ट करने वाली रासायनिक प्रक्रियाओं में भाग लेते हैं।
ओजोन परत के क्षय के प्रभाव
- त्वचा कैंसर का जोखिम बढ़ना।
- आँखों में मोतियाबिंद का जोखिम बढ़ना।
- पौधों और समुद्री सूक्ष्मजीवों पर प्रतिकूल प्रभाव।
प्रमुख अंतरराष्ट्रीय प्रयास
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, 1987 ओजोन परत को क्षति पहुँचाने वाले पदार्थों के उत्पादन और उपयोग को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समझौता है।
ध्यान दें: ओजोन परत का क्षय और वैश्विक तापन अलग-अलग समस्याएँ हैं, हालाँकि कुछ पदार्थ दोनों पर प्रभाव डाल सकते हैं।
11. अम्लीय वर्षा
जब सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड वायुमंडल में रासायनिक अभिक्रियाओं से अम्लीय यौगिक बनाते हैं, तो वे वर्षा, हिमपात, कोहरे या शुष्क निक्षेपण के माध्यम से धरती पर पहुँच सकते हैं। इसे अम्लीय निक्षेपण कहा जाता है; अम्लीय वर्षा इसका एक रूप है।
प्रभाव
- झीलों और नदियों के जल की अम्लता बढ़ना।
- कुछ मृदाओं से पोषक तत्वों का निकल जाना।
- वनस्पति को नुकसान।
- इमारतों और ऐतिहासिक स्मारकों का क्षरण।
रोकथाम
सल्फर और नाइट्रोजन ऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी, स्वच्छ ऊर्जा और औद्योगिक उत्सर्जन नियंत्रण अम्लीय वर्षा की समस्या को कम कर सकते हैं।
12. मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण
मरुस्थलीकरण शुष्क, अर्द्ध-शुष्क और शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तनशीलता और मानवीय गतिविधियों सहित विभिन्न कारणों से भूमि के क्षरण की प्रक्रिया है।
यह केवल रेगिस्तान के फैलने का नाम नहीं है। भूमि की उत्पादकता, वनस्पति आवरण और मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट भी इसका हिस्सा हो सकती है।
प्रमुख कारण
- अत्यधिक चराई।
- वनों की कटाई।
- अनुचित सिंचाई और लवणता।
- मृदा अपरदन।
- जलवायु परिवर्तन एवं सूखा।
- भूमि का असंतुलित उपयोग।
नियंत्रण के उपाय
वर्षा जल संचयन, मिट्टी और जल संरक्षण, स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल वनस्पति, नियंत्रित चराई और टिकाऊ कृषि पद्धतियाँ भूमि क्षरण को कम कर सकती हैं।
13. प्लास्टिक प्रदूषण एवं ठोस अपशिष्ट
प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग और उसका अनुचित निपटान भूमि, नदियों और समुद्रों में प्रदूषण बढ़ाता है। बड़े प्लास्टिक पदार्थ टूटकर छोटे टुकड़ों में बदल सकते हैं, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है।
ठोस अपशिष्ट के प्रमुख प्रकार
- घरेलू कचरा।
- औद्योगिक अपशिष्ट।
- जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट।
- ई-कचरा।
- निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट।
- कृषि अपशिष्ट।
कचरा प्रबंधन के उपाय
- अनावश्यक वस्तुओं की खपत कम करना।
- वस्तुओं का पुनः उपयोग करना।
- पुनर्चक्रण करना।
- जैविक कचरे से कम्पोस्ट बनाना।
- खतरनाक कचरे का अलग और सुरक्षित निपटान करना।
- उत्पादों के जीवन चक्र में अपशिष्ट कम करने पर ध्यान देना।
इसे सामान्यतः 3R सिद्धांत कहा जाता है: Reduce, Reuse और Recycle — कम उपयोग, पुनः उपयोग और पुनर्चक्रण।
14. जल संकट एवं जल संरक्षण
जल संकट तब उत्पन्न होता है, जब किसी क्षेत्र में उपलब्ध सुरक्षित जल उसकी आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त नहीं होता या उसकी गुणवत्ता उपयोग के योग्य नहीं रहती।
प्रमुख कारण
- भूजल का अत्यधिक दोहन।
- वर्षा का असमान वितरण।
- जल स्रोतों का प्रदूषण।
- जल का अपव्यय।
- जलवायु परिवर्तन।
- जनसंख्या और आर्थिक गतिविधियों से बढ़ती मांग।
जल संरक्षण के उपाय
- वर्षा जल संचयन।
- तालाबों और पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन।
- सिंचाई में ड्रिप और स्प्रिंकलर तकनीक का उचित उपयोग।
- अपशिष्ट जल का उपचार और पुनः उपयोग।
- भूजल पुनर्भरण।
- नदी और जलग्रहण क्षेत्र का संरक्षण।
15. सतत विकास का अर्थ
सतत विकास (Sustainable Development) ऐसा विकास है, जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करता है, लेकिन भविष्य की पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से समझौता नहीं करता।
यह परिभाषा 1987 में प्रकाशित ब्रंटलैंड आयोग की रिपोर्ट Our Common Future से प्रसिद्ध हुई।
सतत विकास के तीन परस्पर जुड़े आयाम हैं:
- आर्थिक आयाम: रोजगार, आय और दीर्घकालीन आर्थिक समृद्धि।
- सामाजिक आयाम: समानता, शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता।
- पर्यावरणीय आयाम: प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, प्रदूषण में कमी और पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा।
सतत विकास का अर्थ विकास को पूरी तरह रोक देना नहीं है, बल्कि विकास को इस प्रकार दिशा देना है कि उसके आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय परिणाम दीर्घकाल तक स्वीकार्य रहें।
16. सतत विकास के प्रमुख उपाय
- सौर और पवन ऊर्जा को बढ़ावा देना।
- ऊर्जा दक्षता बढ़ाना।
- सार्वजनिक परिवहन और पैदल चलने योग्य शहर विकसित करना।
- टिकाऊ कृषि पद्धतियाँ अपनाना।
- वन और जैव विविधता संरक्षित करना।
- जल एवं मृदा संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग।
- स्वच्छ उत्पादन और चक्रीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करना।
- शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसरों तक समान पहुँच बढ़ाना।
- पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन और प्रदूषण नियंत्रण करना।
17. सतत विकास लक्ष्य (SDGs)
संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2015 में 2030 एजेंडा के अंतर्गत 17 सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals — SDGs) अपनाए। इनका उद्देश्य गरीबी और भूख कम करना, स्वास्थ्य एवं शिक्षा में सुधार करना, असमानता घटाना और पृथ्वी की रक्षा करना है।
पर्यावरण एवं भूगोल से विशेष रूप से जुड़े लक्ष्य:
- लक्ष्य 6 — स्वच्छ जल एवं स्वच्छता।
- लक्ष्य 7 — सस्ती एवं स्वच्छ ऊर्जा।
- लक्ष्य 11 — सतत शहर एवं समुदाय।
- लक्ष्य 12 — जिम्मेदार उपभोग एवं उत्पादन।
- लक्ष्य 13 — जलवायु कार्रवाई।
- लक्ष्य 14 — जल के नीचे जीवन।
- लक्ष्य 15 — धरती पर जीवन।
अन्य लक्ष्य गरीबी उन्मूलन, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, लैंगिक समानता, रोजगार और संस्थागत सहयोग जैसे विषयों को शामिल करते हैं।
18. प्रमुख अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय समझौते
स्टॉकहोम सम्मेलन, 1972: मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख सम्मेलन, जिसने वैश्विक पर्यावरणीय सहयोग को बढ़ावा दिया।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, 1987: ओजोन परत को क्षति पहुँचाने वाले पदार्थों को नियंत्रित करने से संबंधित।
रियो पृथ्वी सम्मेलन, 1992: पर्यावरण और विकास पर वैश्विक सहयोग को आगे बढ़ाने वाला सम्मेलन।
जैव विविधता अभिसमय, 1992: जैव विविधता संरक्षण, उसके घटकों के सतत उपयोग और आनुवंशिक संसाधनों से प्राप्त लाभों के न्यायसंगत बँटवारे से संबंधित।
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC), 1992: जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग की रूपरेखा।
क्योटो प्रोटोकॉल, 1997: UNFCCC के अंतर्गत कुछ विकसित देशों के लिए उत्सर्जन लक्ष्यों वाला समझौता।
पेरिस समझौता, 2015: वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से काफी नीचे 2°C तक सीमित रखने और 1.5°C तक सीमित करने के प्रयासों को आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखता है।
19. भारत में पर्यावरण संरक्षण
भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए अनेक कानून, नीतियाँ और संस्थाएँ कार्य करती हैं।
प्रमुख संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 48A: राज्य पर्यावरण की रक्षा और सुधार तथा वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा का प्रयास करेगा।
- अनुच्छेद 51A(g): प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण, जिसमें वन, झीलें, नदियाँ और वन्यजीव शामिल हैं, की रक्षा और सुधार करे तथा जीवित प्राणियों के प्रति दया रखे।
- अनुच्छेद 21: न्यायिक व्याख्या के माध्यम से स्वच्छ एवं स्वस्थ पर्यावरण को जीवन के अधिकार से जोड़ा गया है।
प्रमुख पर्यावरणीय कानून
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972।
- जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974।
- वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, जिसे 2023 में संशोधित किया गया।
- वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981।
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986।
- जैव विविधता अधिनियम, 2002।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010।
किसी कानून के लागू होने, संशोधन और वर्तमान प्रावधानों से जुड़े प्रश्नों के लिए आधिकारिक अधिनियम एवं नवीनतम संशोधनों को देखना उपयोगी है।
20. भारत के प्रमुख पर्यावरणीय आंदोलन
चिपको आंदोलन: पेड़ों की कटाई रोकने के लिए स्थानीय समुदायों, विशेषकर महिलाओं, की भागीदारी वाला आंदोलन। यह 1970 के दशक में उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में प्रसिद्ध हुआ।
अप्पिको आंदोलन: 1980 के दशक में कर्नाटक में वन संरक्षण के लिए चला आंदोलन।
साइलेंट वैली आंदोलन: केरल में साइलेंट वैली के उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन और जैव विविधता की रक्षा से जुड़ा आंदोलन।
इन आंदोलनों ने वन संरक्षण, स्थानीय समुदायों की भूमिका और विकास परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव पर राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया।
21. पर्यावरण संरक्षण में नागरिकों की भूमिका
- पानी और बिजली का विवेकपूर्ण उपयोग करना।
- सार्वजनिक परिवहन, साइकिल या पैदल चलने को प्राथमिकता देना, जहाँ संभव हो।
- कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में बाँटना।
- एकल-उपयोग प्लास्टिक का उपयोग कम करना।
- स्थानीय जैव विविधता और प्राकृतिक आवासों की रक्षा करना।
- पौधे लगाना और उनकी देखभाल करना।
- जल स्रोतों में कचरा न डालना।
- पर्यावरणीय नियमों का पालन करना।
- समुदाय में पर्यावरण शिक्षा और जागरूकता बढ़ाना।
- संसाधनों की बचत और जिम्मेदार उपभोग को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना।
22. अध्याय का सारांश
पर्यावरण पृथ्वी पर जीवन का आधार है। वायु और जल प्रदूषण, वनों की कटाई, जैव विविधता का ह्रास, जलवायु परिवर्तन, मरुस्थलीकरण और अपशिष्ट प्रबंधन जैसी समस्याएँ मानव तथा प्राकृतिक प्रणालियों को प्रभावित करती हैं।
इन समस्याओं के समाधान के लिए वैज्ञानिक समझ, प्रभावी कानून, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, तकनीकी नवाचार और नागरिक भागीदारी आवश्यक हैं। सतत विकास आर्थिक प्रगति, सामाजिक कल्याण और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।
23. महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
प्रश्न 1. पारिस्थितिकी का वैज्ञानिक अध्ययन मुख्य रूप से किससे संबंधित है?
(A) केवल चट्टानों से
(B) जीवों और उनके पर्यावरण के संबंधों से
(C) केवल महासागरों से
(D) केवल जनसंख्या से
उत्तर: (B)
व्याख्या: पारिस्थितिकी जीवों तथा उनके जैविक और अजैविक पर्यावरण के बीच संबंधों का अध्ययन करती है।
प्रश्न 2. पारिस्थितिकी शब्द का प्रयोग 1866 में किसने किया था?
(A) चार्ल्स डार्विन
(B) अर्न्स्ट हैकेल
(C) ग्रेगर मेंडल
(D) अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट
उत्तर: (B)
व्याख्या: जर्मन जीवविज्ञानी अर्न्स्ट हैकेल ने 1866 में Ecology शब्द का प्रयोग किया था।
प्रश्न 3. PM2.5 का संबंध किससे है?
(A) समुद्र की लवणता
(B) सूक्ष्म वायु कण
(C) मृदा की उर्वरता
(D) भूजल स्तर
उत्तर: (B)
व्याख्या: PM2.5 लगभग 2.5 माइक्रोमीटर या उससे छोटे व्यास वाले वायु कणों को दर्शाता है।
प्रश्न 4. जल में पोषक तत्वों की अत्यधिक वृद्धि से होने वाली प्रक्रिया क्या कहलाती है?
(A) मरुस्थलीकरण
(B) सुपोषण
(C) वनीकरण
(D) अपक्षय
उत्तर: (B)
व्याख्या: जल में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्वों की अत्यधिक वृद्धि सुपोषण का कारण बन सकती है।
प्रश्न 5. ओजोन परत मुख्यतः वायुमंडल की किस परत में स्थित है?
(A) क्षोभमंडल
(B) समतापमंडल
(C) मध्यमंडल
(D) बहिर्मंडल
उत्तर: (B)
व्याख्या: ओजोन परत मुख्य रूप से समतापमंडल में पाई जाती है और हानिकारक पराबैंगनी विकिरण को अवशोषित करती है।
प्रश्न 6. मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल किस वर्ष अपनाया गया?
(A) 1972
(B) 1987
(C) 1992
(D) 2015
उत्तर: (B)
व्याख्या: मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल 1987 में अपनाया गया और इसका संबंध ओजोन-क्षयकारी पदार्थों से है।
प्रश्न 7. सतत विकास की प्रसिद्ध परिभाषा किस रिपोर्ट से जुड़ी है?
(A) Limits to Growth
(B) Our Common Future
(C) Silent Spring
(D) The Wealth of Nations
उत्तर: (B)
व्याख्या: 1987 में प्रकाशित ब्रंटलैंड आयोग की रिपोर्ट Our Common Future में सतत विकास की प्रसिद्ध परिभाषा दी गई।
प्रश्न 8. संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों की संख्या कितनी है?
(A) 10
(B) 15
(C) 17
(D) 21
उत्तर: (C)
व्याख्या: संयुक्त राष्ट्र ने 2015 में 2030 एजेंडा के अंतर्गत 17 सतत विकास लक्ष्य अपनाए।
प्रश्न 9. भारत के संविधान का कौन-सा अनुच्छेद पर्यावरण की रक्षा करना नागरिक का मौलिक कर्तव्य बताता है?
(A) अनुच्छेद 14
(B) अनुच्छेद 21A
(C) अनुच्छेद 51A(g)
(D) अनुच्छेद 368
उत्तर: (C)
व्याख्या: अनुच्छेद 51A(g) प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार को नागरिक का मौलिक कर्तव्य बताता है।
प्रश्न 10. अनुच्छेद 48A किससे संबंधित है?
(A) राष्ट्रपति का चुनाव
(B) राज्य द्वारा पर्यावरण, वन और वन्यजीवों की रक्षा का प्रयास
(C) वित्त आयोग
(D) नागरिकता
उत्तर: (B)
व्याख्या: अनुच्छेद 48A राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों में आता है और पर्यावरण संरक्षण से संबंधित है।
प्रश्न 11. चिपको आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य क्या था?
(A) खनिज उत्पादन बढ़ाना
(B) पेड़ों की कटाई रोकना और वन संरक्षण
(C) समुद्री व्यापार बढ़ाना
(D) सिंचाई कर समाप्त करना
उत्तर: (B)
व्याख्या: चिपको आंदोलन में स्थानीय लोगों ने पेड़ों की कटाई रोकने और वन संरक्षण के लिए सक्रिय भागीदारी की।
प्रश्न 12. निम्नलिखित में से कौन-सा स्वस्थाने संरक्षण का उदाहरण है?
(A) बीज बैंक
(B) चिड़ियाघर
(C) राष्ट्रीय उद्यान
(D) प्रयोगशाला में जीन संरक्षण
उत्तर: (C)
व्याख्या: राष्ट्रीय उद्यान में जीवों को उनके प्राकृतिक आवास में संरक्षित किया जाता है।
प्रश्न 13. पेरिस समझौता किस वर्ष अपनाया गया?
(A) 1987
(B) 1992
(C) 1997
(D) 2015
उत्तर: (D)
व्याख्या: पेरिस समझौता 2015 में अपनाया गया और इसका मुख्य संबंध जलवायु परिवर्तन से है।
प्रश्न 14. 3R सिद्धांत में कौन-से तीन विचार शामिल हैं?
(A) Read, Repeat, Recall
(B) Reduce, Reuse, Recycle
(C) Repair, Remove, Replace
(D) Restore, React, Recover
उत्तर: (B)
व्याख्या: 3R सिद्धांत का उद्देश्य संसाधनों की खपत और कचरे को कम करना है।
प्रश्न 15. मरुस्थलीकरण के संबंध में कौन-सा कथन सही है?
(A) यह केवल प्राकृतिक रेगिस्तानों के फैलने का नाम है।
(B) यह केवल भारी वर्षा से होता है।
(C) यह शुष्क क्षेत्रों में भूमि क्षरण की प्रक्रिया है, जिसमें प्राकृतिक और मानवीय कारक शामिल हो सकते हैं।
(D) इसका कृषि से कोई संबंध नहीं है।
उत्तर: (C)
व्याख्या: मरुस्थलीकरण में भूमि की उत्पादकता और गुणवत्ता में गिरावट शामिल है। इसके कारणों में अत्यधिक चराई, वनों की कटाई, अनुचित भूमि उपयोग और सूखा शामिल हो सकते हैं।
निष्कर्ष
पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज, उद्योगों और प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग, प्रदूषण में कमी, जैव विविधता का संरक्षण और सतत विकास की नीतियाँ वर्तमान तथा भविष्य की पीढ़ियों के लिए स्वस्थ पर्यावरण बनाए रखने में महत्वपूर्ण हैं।
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