राज्यों के नाम बदले हैं, सीमाएं बदली हैं, नए राज्य बने हैं और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार पुनर्गठन हुआ है।

इसलिए “संघ और उसका राज्यक्षेत्र” मेरे लिए केवल भारतीय संविधान का एक छोटा अध्याय नहीं है।

यह उस सवाल का उत्तर है कि—

भारत एक संघ के रूप में अपनी एकता बनाए रखते हुए अपने राज्यों और प्रशासनिक क्षेत्रों में परिवर्तन कैसे कर सकता है?


संघ और उसका राज्यक्षेत्र क्या है?

भारतीय संविधान के भाग-I का विषय है—

संघ और उसका राज्यक्षेत्र।

इस भाग में मुख्य रूप से अनुच्छेद 1 से अनुच्छेद 4 तक के प्रावधान हैं।

पहली नजर में चार अनुच्छेद बहुत कम लगते हैं, लेकिन इन्हीं में भारत के नाम, राज्यक्षेत्र, नए राज्यों के प्रवेश या स्थापना तथा राज्यों के क्षेत्र, सीमा और नाम में परिवर्तन से संबंधित महत्वपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था मिलती है।

मैं विद्यार्थियों को इन चार अनुच्छेदों को याद कराने के बजाय पहले इनका अर्थ समझाने की कोशिश करता हूँ।

मैं कहता हूँ—

  • अनुच्छेद 1 — भारत की पहचान
  • अनुच्छेद 2 — नए राज्य का प्रवेश या स्थापना
  • अनुच्छेद 3 — राज्यों में परिवर्तन
  • अनुच्छेद 4 — उन परिवर्तनों के कारण आवश्यक संवैधानिक व्यवस्था

अब इन्हें एक-एक करके समझते हैं।

अनुच्छेद 1: भारत, अर्थात् इंडिया, राज्यों का संघ है

अनुच्छेद 1 भारत की संवैधानिक पहचान से संबंधित है।

संविधान कहता है— “India, that is Bharat, shall be a Union of States.” अर्थात्— भारत, अर्थात् इंडिया, राज्यों का संघ होगा।

यहां एक शब्द पर विशेष ध्यान देना चाहिए—

“Union” ( संघ)

भारत का राज्यक्षेत्र क्या है?

“राज्य” और “राज्यक्षेत्र” समान शब्द नहीं हैं।


इसे एक आसान उदाहरण से समझिए

मैं कक्षा में विद्यार्थियों से कभी-कभी कहता हूँ—


अनुच्छेद 2: क्या भारत में नया राज्य आ सकता है?

अब मान लीजिए हमसे पूछा जाए—

“यदि किसी नए क्षेत्र को भारत के संघ में शामिल करना हो तो संविधान में इसकी व्यवस्था है या नहीं?”

इस प्रश्न का संबंध अनुच्छेद 2 से है।


अनुच्छेद 2 को याद रखने का मेरा तरीका

मैं इसे विद्यार्थियों से केवल एक लाइन में याद करने को कहता हूँ—

“अनुच्छेद 2 — नए राज्य का प्रवेश या स्थापना।”

अब आगे बढ़ते हैं, क्योंकि असली परीक्षा अक्सर अनुच्छेद 2 और 3 के अंतर पर होती है।

अनुच्छेद 3: राज्यों के निर्माण और परिवर्तन की शक्ति

नया राज्य बनाया जा सकता है

किसी राज्य से क्षेत्र अलग करके नया राज्य बनाया जा सकता है।

राज्यों को मिलाया जा सकता है

दो या अधिक राज्यों या उनके हिस्सों को मिलाकर नया राज्य बनाया जा सकता है।

किसी राज्य का क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है

किसी राज्य के क्षेत्र में वृद्धि की जा सकती है।

किसी राज्य का क्षेत्र घटाया जा सकता है

किसी राज्य के क्षेत्र में कमी की जा सकती है।

राज्य की सीमा बदली जा सकती है

किसी राज्य की सीमा में परिवर्तन किया जा सकता है।

राज्य का नाम बदला जा सकता है

किसी राज्य के नाम में भी परिवर्तन किया जा सकता है।

इसलिए मैं विद्यार्थियों से कहता हूँ—

यह राज्यों के निर्माण और पुनर्गठन की व्यापक संवैधानिक व्यवस्था है।

क्या राज्य की सीमा बदलने के लिए राज्य की सहमति जरूरी है?

नहीं।

“राय” और “सहमति” एक ही चीज नहीं है।

यदि प्रश्न में लिखा हो—

एक और अध्यापक वाला उदाहरण

“आपकी राय क्या है?”

वे अपनी राय देते हैं।

इसी तरह अनुच्छेद 3 की प्रक्रिया में राज्य विधानमंडल की राय और अंतिम संवैधानिक शक्ति के बीच अंतर समझना चाहिए।


अनुच्छेद 4: अनुसूचियों में परिवर्तन कैसे होगा?

अब मान लीजिए अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के अंतर्गत कोई कानून बना दिया गया।

तो उससे संविधान की अनुसूचियों में भी बदलाव की जरूरत पड़ सकती है।

यहीं अनुच्छेद 4 महत्वपूर्ण हो जाता है।

अनुच्छेद 4 के अनुसार अनुच्छेद 2 और 3 के तहत बनाए गए कानून में प्रथम अनुसूची और चतुर्थ अनुसूची में आवश्यक संशोधन किए जा सकते हैं।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे कानून को अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए संविधान संशोधन नहीं माना जाता।

इसे परीक्षा की भाषा में बहुत सावधानी से याद करना चाहिए।


प्रथम अनुसूची क्यों महत्वपूर्ण है?

प्रथम अनुसूची में राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों से संबंधित विवरण दिया जाता है। इसलिए यदि राज्यों की संरचना या उनके क्षेत्रीय विवरण में बदलाव होता है, तो प्रथम अनुसूची में भी आवश्यक परिवर्तन करने पड़ सकते हैं।


चतुर्थ अनुसूची क्यों महत्वपूर्ण है?

चतुर्थ अनुसूची का संबंध राज्यसभा में राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के लिए सीटों के आवंटन से है।

इसलिए राज्यों की संरचना में परिवर्तन होने पर इससे जुड़े संवैधानिक विवरणों में भी आवश्यक परिवर्तन की आवश्यकता हो सकती है।

अनुच्छेद 4 इसी प्रकार के आवश्यक परिवर्तनों के लिए महत्वपूर्ण संवैधानिक आधार प्रदान करता है।

राज्यों का पुनर्गठन आखिर क्यों हुआ?

क्या राज्यों का निर्माण केवल भाषा के आधार पर हुआ?

राज्य और संघ राज्य क्षेत्र में क्या अंतर है?

अब एक सामान्य सवाल यह है कि — “राज्य और संघ राज्य क्षेत्र दोनों भारत का हिस्सा हैं, तो फिर दोनों को अलग क्यों रखा गया?”


इस अध्याय को पढ़ते समय मेरी सबसे जरूरी सलाह

यदि आप UPSC, UPPCS, SSC, रेलवे, पुलिस या किसी अन्य प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो इस अध्याय को केवल रटने की कोशिश न करें।

चार अनुच्छेदों को एक कहानी में याद कीजिए

मैं अगर कक्षा समाप्त होने से पहले विद्यार्थियों को केवल एक मिनट में यह अध्याय दोहराऊँ, तो शायद इस तरह कहूँगा—

पहले भारत की पहचान बताई गई — अनुच्छेद 1।

फिर नए राज्य के प्रवेश या स्थापना की व्यवस्था — अनुच्छेद 2।

फिर राज्यों को बनाने और उनके क्षेत्र, सीमा तथा नाम में बदलाव की शक्ति — अनुच्छेद 3।

और अंत में इन परिवर्तनों से संबंधित अनुसूचियों में आवश्यक बदलाव की व्यवस्था — अनुच्छेद 4।

यानी—

1 = पहचान
2 = प्रवेश
3 = परिवर्तन
4 = संवैधानिक समायोजन

इसे मैंने विद्यार्थियों के लिए जानबूझकर इस रूप में रखा है, क्योंकि मुझे लगता है कि कोई भी विषय तब अधिक समय तक याद रहता है जब उसका अपना एक मानसिक ढांचा बना लिया जाए।

प्रश्न: भारत को संविधान में किस रूप में वर्णित किया गया है?

उत्तर: राज्यों के संघ के रूप में।

प्रश्न: नए राज्यों के प्रवेश या स्थापना से संबंधित प्रावधान किस अनुच्छेद में है?

उत्तर: अनुच्छेद 2।

प्रश्न: राज्य का क्षेत्र बढ़ाने या घटाने की शक्ति किस अनुच्छेद में है?

उत्तर: अनुच्छेद 3।

प्रश्न: राज्य की सीमा बदलने की शक्ति किसके पास है?

उत्तर: संसद को अनुच्छेद 3 के अंतर्गत कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है।

प्रश्न: क्या राज्य विधानमंडल की सहमति अनिवार्य है?

उत्तर: नहीं। संबंधित प्रक्रिया में उसके विचार प्राप्त किए जाते हैं, लेकिन उसकी राय संसद पर बाध्यकारी नहीं है।

प्रश्न: अनुच्छेद 4 किससे संबंधित है?


एक छोटी-सी पुनरावृत्ति


वह बताता है कि भारत की एकता और राज्यों की विविधता को एक साथ संभालने के लिए संविधान ने कितनी सोच-समझकर व्यवस्था बनाई है।

इसीलिए मैं विद्यार्थियों से कहता हूँ—

संविधान को केवल अनुच्छेदों की सूची मत समझिए।

हर अनुच्छेद के पीछे यह सवाल खोजिए कि—

“इसे रखने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?”

जब आप यह सवाल पूछना शुरू कर देंगे, तो भारतीय राजव्यवस्था आपको रटने वाला विषय कम और समझने वाला विषय अधिक लगने लगेगा।

“संघ और उसका राज्यक्षेत्र” भी उसी समझ की शुरुआत है।

भारत एक है।

उसके भीतर अनेक राज्य हैं।

उनकी पहचान अलग हो सकती है।

उनकी सीमाएं समय के साथ बदल सकती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) जो परीक्षा से संबन्धित है

संघ और उसका राज्यक्षेत्र किस भाग में है?

भारतीय संविधान के भाग-I में संघ और उसके राज्यक्षेत्र से संबंधित प्रावधान हैं।

संघ और उसका राज्यक्षेत्र में कौन-कौन से अनुच्छेद आते हैं?

मुख्य रूप से अनुच्छेद 1 से 4 तक।

अनुच्छेद 1 क्या बताता है?

अनुच्छेद 1 भारत के नाम तथा भारत के राज्यक्षेत्र की संवैधानिक स्थिति बताता है और भारत को राज्यों का संघ घोषित करता है।

अनुच्छेद 2 किससे संबंधित है?

नए राज्यों के भारत के संघ में प्रवेश या नए राज्यों की स्थापना से।

अनुच्छेद 3 किससे संबंधित है?

नए राज्यों के निर्माण तथा राज्यों के क्षेत्र, सीमा और नाम में परिवर्तन से।

क्या राज्य विधानमंडल की सहमति के बिना राज्य की सीमा बदली जा सकती है?

संविधान संबंधित राज्य विधानमंडल के विचार प्राप्त करने की प्रक्रिया निर्धारित करता है, लेकिन उसकी राय संसद के लिए बाध्यकारी नहीं है।

अनुच्छेद 4 का क्या महत्व है?

यह अनुच्छेद 2 और 3 के तहत बनाए गए कानूनों के कारण प्रथम और चतुर्थ अनुसूची में आवश्यक परिवर्तन तथा ऐसे कानूनों की संवैधानिक स्थिति से संबंधित है।

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