Russian Revolution रूसी क्रांति क्या है? यह रूस में हुआ वह राजनीतिक और सामाजिक बदलाव था, जिसने रूस को एक कृषि प्रधान पिछड़े देश से बदलकर दुनिया का पहला समाजवादी (Socialist) देश बना दिया। इसमें दो मुख्य विद्रोह हुए: पहला फरवरी 1917 में (जिसने राजा को हटाया) और दूसरा अक्टूबर 1917 में (जिसने कम्युनिस्ट शासन स्थापित किया)।
यह क्यों हुई? (प्रमुख कारण) –
क्रांति के पीछे कोई एक कारण नहीं था, बल्कि कई समस्याओं का मिश्रण था:
तत्कालिक कारण (प्रथम विश्व युद्ध): प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) में रूस की करारी हार हुई। युद्ध की वजह से देश में अकाल पड़ा, महंगाई बढ़ गई और लगभग 70 लाख रूसी सैनिक मारे गए या लापता हो गए। इससे जनता का गुस्सा फूट पड़ा।
राजनीतिक कारण: रूस का राजा जार निकोलस II एक तानाशाह था। वह जनता की जरूरतों के प्रति अंधा था और अपनी पत्नी ‘जरीना’ और पाखंडी साधु ‘रासपुतिन’ के प्रभाव में था।
आर्थिक कारण: 19वीं सदी के अंत में रूस में औद्योगिक क्रांति तो आई, लेकिन मजदूरों की हालत खराब थी। उन्हें कम वेतन में 12-15 घंटे काम करना पड़ता था। किसानों के पास जमीनें नहीं थीं, वे जमींदारों के कर्ज तले दबे थे।
यह कैसे हुई? (क्रांति की प्रक्रिया)
रूसी क्रांति दो चरणों में पूरी हुई:
अक्टूबर क्रांति (नवंबर 1917): अस्थायी सरकार जनता की उम्मीदें पूरी नहीं कर पाई। तब व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों ने नारा दिया— “शांति, भूमि और रोटी”। उन्होंने एक संगठित विद्रोह किया और सत्ता पर कब्जा कर लिया। इसे ‘रक्तहीन क्रांति’ भी कहा जाता है क्योंकि यह बहुत कम हिंसा के साथ सफल हुई।
फरवरी क्रांति (मार्च 1917): पेट्रोग्राद की सड़कों पर “रोटी दो” के नारों के साथ महिलाओं और मजदूरों ने हड़ताल कर दी। जब सेना को उन पर गोली चलाने का आदेश दिया गया, तो सेना ने मना कर दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिल गई। जार को गद्दी छोड़नी पड़ी और एक अस्थायी सरकार (Provisional Government) बनी।
रूसी क्रांति के कारण Russian Revolution
1. राजनीतिक कारण: जार का निरंकुश शासन
रूस का शासक जार निकोलस II दैवीय अधिकारों में विश्वास रखता था। वह मानता था कि राजा को शासन करने का अधिकार ईश्वर से मिला है और वह जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है।
- प्रशासनिक भ्रष्टाचार: नौकरशाही अक्षम और भ्रष्ट थी। ऊंचे पदों पर योग्यता के बजाय चापलूसी को महत्व दिया जाता था।
- रासपुतिन का प्रभाव: जार की पत्नी, महारानी एलेक्जेंड्रा, एक पाखंडी साधु ‘रासपुतिन’ के प्रभाव में थी, जो राजकाज में अनुचित हस्तक्षेप करता था। इससे राजघराने की प्रतिष्ठा गिर गई।
2. आर्थिक कारण: किसानों और मजदूरों की बदहाली
रूस मूलतः एक कृषि प्रधान देश था, लेकिन फिर भी किसान गरीबी के दुष्चक्र में फंसे थे।
- किसानों की समस्या: रूस में सामंतवाद तो खत्म हो गया था, लेकिन जमीनों का मालिकाना हक अभी भी बड़े जमींदारों के पास था। छोटे किसानों के पास जमीन कम थी और टैक्स का बोझ बहुत ज्यादा।
- मजदूरों का शोषण: औद्योगिक क्रांति की शुरुआत के साथ मजदूरों की संख्या बढ़ी। उन्हें बेहद खराब माहौल में 12 से 15 घंटे काम करना पड़ता था। ट्रेड यूनियनों पर पाबंदी थी, जिससे उनमें भारी असंतोष था।
3. सामाजिक कारण: ‘रूसिकरण’ की नीति
रूसी साम्राज्य बहुत विशाल था, जिसमें पोल, फिन, यहूदी और उज्बेक जैसे विभिन्न अल्पसंख्यक रहते थे।
- जार ने इन सभी पर रूसी भाषा और संस्कृति थोपने का प्रयास किया (Russification Policy)।
- इस दमनकारी नीति ने अल्पसंख्यकों को जार का कट्टर दुश्मन बना दिया और वे क्रांतिकारी आंदोलनों में शामिल होने लगे।
4. वैचारिक कारण: नए सिद्धांतों का उदय
रूस के बुद्धिजीवी वर्ग पर कार्ल मार्क्स की विचारधारा का गहरा प्रभाव पड़ा।
- मार्क्स ने तर्क दिया कि मजदूरों को अपनी मुक्ति के लिए पूंजीवाद और राजशाही को उखाड़ फेंकना होगा।
- लेनिन ने इन विचारों को रूसी परिस्थितियों के अनुसार ढाला, जिससे आम जनता को एक स्पष्ट लक्ष्य और दिशा मिली।
5. तात्कालिक कारण: प्रथम विश्व युद्ध और सैन्य असफलता
1914 में शुरू हुए प्रथम विश्व युद्ध ने रूसी साम्राज्य की कमर तोड़ दी।
- भारी जनहानि: युद्ध में लगभग 70 लाख रूसी सैनिक मारे गए या लापता हुए। सेना के पास न आधुनिक हथियार थे, न पर्याप्त रसद।
- आर्थिक संकट: युद्ध के कारण औद्योगिक उत्पादन गिर गया, रेलवे ठप हो गई और शहरों में अनाज की भारी किल्लत हो गई।
- महंगाई और अकाल: 1916-17 की भीषण सर्दियों में लोग भूख से मरने लगे। रोटी के लिए शुरू हुए दंगों ने ही अंततः क्रांति का रूप ले लिया।
महत्वपूर्ण घटना: “खूनी रविवार” (Bloody Sunday – 1905)
क्रांति की नींव 1905 में ही पड़ गई थी जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे मजदूरों पर जार की सेना ने गोलियां चलाई थीं। इस घटना ने जार के प्रति जनता के मन में रहे बचे सम्मान को भी खत्म कर दिया।
निष्कर्ष: इन सभी कारणों ने मिलकर रूस को एक ऐसे बारूद के ढेर पर खड़ा कर दिया था, जहाँ प्रथम विश्व युद्ध की कठिनाइयों ने एक ‘चिंगारी’ का काम किया और सदियों पुरानी राजशाही ढह गई।
प्रश्न 1: ‘खूनी रविवार’ (Bloody Sunday) की घटना क्या थी और इसका क्या महत्व है?
उत्तर: 22 जनवरी 1905 को रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में पादरी गैपन के नेतृत्व में मजदूर जार को एक याचिका देने जा रहे थे। जार की सेना ने इन निहत्थे लोगों पर गोलियां चला दीं, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए।
महत्व: इस घटना ने जार के प्रति जनता के विश्वास को पूरी तरह खत्म कर दिया और 1905 की पहली विफल क्रांति का आधार बनी, जिसे 1917 की क्रांति की ‘ड्रेस रिहर्सल’ कहा जाता है।
प्रश्न 2: व्लादिमीर लेनिन की ‘अप्रैल थीसिस’ (April Thesis) क्या थी?
उत्तर: निर्वासन से लौटने के बाद लेनिन ने बोल्शेविकों के सामने तीन मुख्य मांगें रखीं, जिन्हें ‘अप्रैल थीसिस’ कहा जाता है:
1-युद्ध (प्रथम विश्व युद्ध) को तुरंत समाप्त किया जाए।
2-सारी जमीन किसानों के हवाले की जाए।
3-बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया जाए।
प्रश्न 3: व्लादिमीर लेनिन की ‘अप्रैल थीसिस’ का रूसी क्रांति की दिशा बदलने में क्या योगदान था?
उत्तर: निर्वासन से लौटने के बाद अप्रैल 1917 में लेनिन ने जो कार्यक्रम प्रस्तुत किया, उसे ‘अप्रैल थीसिस’ कहा जाता है। इसमें तीन मुख्य मांगें थीं: युद्ध की समाप्ति, भूमि का किसानों को हस्तांतरण और बैंकों का राष्ट्रीयकरण।
उस समय रूस की अस्थायी सरकार युद्ध जारी रखना चाहती थी, जिससे जनता नाराज थी। लेनिन ने “भूमि, शांति और रोटी” का नारा देकर आम जनमानस की नब्ज पकड़ ली। अप्रैल थीसिस ने बोल्शेविक पार्टी को एक स्पष्ट लक्ष्य और दिशा प्रदान की। इसने अस्थायी सरकार की कमजोरियों को उजागर किया और सोवियत के हाथों में पूरी सत्ता देने की मांग को मजबूती दी। इसी वैचारिक स्पष्टता के कारण अक्टूबर 1917 में बोल्शेविक एक सफल क्रांति करने में सक्षम हुए।
प्रश्न 4: रूसी क्रांति के वैश्विक प्रभावों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर: रूसी क्रांति केवल रूस तक सीमित नहीं रही, इसने पूरी दुनिया की राजनीति को प्रभावित किया। सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव ‘सोवियत संघ’ (USSR) के रूप में दुनिया के पहले समाजवादी राज्य का उदय था। इसने पूंजीवाद के विकल्प के रूप में एक नई आर्थिक प्रणाली पेश की।
क्रांति ने एशिया और अफ्रीका के औपनिवेशिक देशों में स्वतंत्रता आंदोलनों को नई ऊर्जा दी, क्योंकि सोवियत संघ ने उपनिवेशवाद का विरोध किया था। भारत में भी भगत सिंह और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेता इससे प्रभावित हुए। वैश्विक स्तर पर मजदूरों के अधिकारों के प्रति चेतना बढ़ी और कई देशों ने ‘कल्याणकारी राज्य’ (Welfare State) की अवधारणा अपनाई। हालांकि, इसने दुनिया को दो वैचारिक गुटों में भी बांट दिया, जो बाद में ‘शीत युद्ध’ का मुख्य कारण बना।
प्रश्न 6: डॉ. सन यात-सेन के ‘तीन सिद्धांतों’ का चीनी क्रांति में महत्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: डॉ. सन यात-सेन को ‘आधुनिक चीन का पिता’ कहा जाता है। उन्होंने 1911 की क्रांति का नेतृत्व किया और तीन सिद्धांत दिए: राष्ट्रवाद, लोकतंत्र और जन-आजीविका।
राष्ट्रवाद: इसका अर्थ था मंचू राजवंश के शासन को समाप्त करना और विदेशी साम्राज्यवाद से चीन को मुक्त कराना।
.लोकतंत्र: राजशाही को हटाकर गणतांत्रिक सरकार की स्थापना करना।
.जन-आजीविका: इसका उद्देश्य भूमि सुधार करना और गरीबी दूर करना था।
.इन सिद्धांतों ने बिखरे हुए चीन को एकजुट करने का एक वैचारिक ढांचा प्रदान किया। हालांकि वे अपने जीवनकाल में इन्हें पूरी तरह लागू नहीं कर पाए, लेकिन इन्हीं सिद्धांतों ने आगे चलकर कम्युनिस्ट और राष्ट्रवादी दोनों पार्टियों को प्रेरणा दी।
प्रश्न 7: माओ त्से तुंग ने चीनी क्रांति को रूस से अलग किस प्रकार सफल बनाया?
उत्तर: माओ त्से तुंग ने मार्क्सवाद को चीनी परिस्थितियों के अनुसार ढाला। रूसी क्रांति मुख्य रूप से शहर के औद्योगिक मजदूरों पर आधारित थी, लेकिन माओ ने महसूस किया कि चीन में मजदूर कम और किसान अधिक हैं।
माओ ने ‘किसानों’ को क्रांति का मुख्य आधार बनाया। उन्होंने “गांवों से शहरों को घेरने” की सैन्य रणनीति अपनाई। माओ ने लाल सेना (Red Army) को अनुशासित किया और किसानों के बीच रहकर उनका विश्वास जीता। जहाँ रूस में क्रांति एक बड़े विस्फोट की तरह हुई, वहीं चीन में यह एक लंबा सशस्त्र संघर्ष (Guerrilla Warfare) था। माओ की यह ‘कृषि-आधारित साम्यवाद’ की नीति ही चीन में 1949 की सफलता का मुख्य कारण बनी।