भारतीय संविधान की उद्देशिका (Preamble of the Indian Constitution)
1. उद्देशिका का परिचय
भारतीय संविधान की उद्देशिका संविधान के मूल दर्शन, आदर्शों और उद्देश्यों को संक्षेप में प्रस्तुत करती है। इसे संविधान की प्रस्तावना भी कहा जाता है। इसमें उन प्रमुख मूल्यों का उल्लेख है जिनके आधार पर भारत की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का निर्माण किया जाना है।
उद्देशिका यह स्पष्ट करती है कि भारत किस प्रकार का राष्ट्र है और भारतीय राज्य किन आदर्शों को प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता जैसे मूल्यों को विशेष महत्व दिया गया है।
उद्देशिका की शुरुआत “हम, भारत के लोग” शब्दों से होती है। इसका आशय है कि भारतीय संविधान की सत्ता और वैधता का मूल स्रोत भारत की जनता है। संविधान जनता की ओर से स्वीकार किया गया है और शासन की सभी संस्थाएँ संविधान के अधीन कार्य करती हैं।
2. भारतीय संविधान की उद्देशिका का मूल पाठ
हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को:
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय;
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता;
प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ईस्वी (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
3. उद्देशिका का ऐतिहासिक विकास
भारतीय संविधान की उद्देशिका का वैचारिक आधार संविधान सभा में प्रस्तुत उद्देश्य प्रस्ताव से जुड़ा है। जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया था। संविधान सभा ने इसे 22 जनवरी 1947 को स्वीकार किया।
उद्देश्य प्रस्ताव ने स्वतंत्र भारत की संवैधानिक व्यवस्था के प्रमुख आदर्शों को सामने रखा। इसमें संप्रभुता, लोकतांत्रिक शासन, न्याय, समानता और स्वतंत्रता जैसे विचारों को महत्व दिया गया।
संविधान सभा ने इन आदर्शों को संविधान निर्माण की प्रक्रिया में आधार बनाया। अंतिम रूप में उद्देशिका संविधान के आरंभ में शामिल की गई, ताकि संविधान के मूल उद्देश्य और दर्शन स्पष्ट रहें।
4. उद्देशिका में प्रयुक्त प्रमुख शब्दों का अर्थ
(क) सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न
सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न का अर्थ है कि भारत आंतरिक और बाहरी मामलों में स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार रखता है। भारत किसी विदेशी शक्ति के अधीन नहीं है और अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार घरेलू तथा विदेश नीति निर्धारित कर सकता है।
संप्रभुता का अर्थ यह भी है कि भारत अपनी संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार शासन करता है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भारत स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भाग लेता है।
(ख) समाजवादी
समाजवादी शब्द का उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक न्याय की दिशा में राज्य की प्रतिबद्धता को व्यक्त करना है। भारतीय संदर्भ में इसका संबंध अवसरों की समानता, आर्थिक विषमता को कम करने, कमजोर वर्गों के कल्याण और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण से है।
भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत समाजवादी आदर्शों को अपनाया है। इसका अर्थ निजी संपत्ति या निजी उद्यम के पूर्ण उन्मूलन से नहीं है। भारतीय व्यवस्था में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र दोनों की भूमिका हो सकती है।
समाजवादी शब्द को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा उद्देशिका में जोड़ा गया।
(ग) पंथनिरपेक्ष
पंथनिरपेक्षता का अर्थ है कि राज्य किसी एक धर्म को अपना आधिकारिक धर्म घोषित करके अन्य धर्मों के नागरिकों के साथ भेदभाव नहीं करता। भारत में सभी व्यक्तियों को कानून के अधीन समानता और धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त है।
भारतीय पंथनिरपेक्षता धार्मिक स्वतंत्रता, सभी धर्मों के प्रति समान संवैधानिक सम्मान और राज्य द्वारा धार्मिक आधार पर भेदभाव न करने के सिद्धांत से जुड़ी है।
पंथनिरपेक्ष शब्द भी 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा उद्देशिका में जोड़ा गया।
(घ) लोकतंत्रात्मक
लोकतंत्रात्मक व्यवस्था में जनता शासन की अंतिम राजनीतिक स्रोत होती है। जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है और सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है।
भारत में संसदीय लोकतंत्र अपनाया गया है। नियमित चुनाव, राजनीतिक भागीदारी, कानून का शासन और संवैधानिक अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण तत्व हैं।
लोकतंत्र केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं है। इसमें नागरिक स्वतंत्रता, असहमति का अधिकार, उत्तरदायी शासन और समान राजनीतिक भागीदारी भी महत्वपूर्ण हैं।
(ङ) गणराज्य
गणराज्य का अर्थ है कि देश का राष्ट्राध्यक्ष वंशानुगत राजतंत्र के आधार पर पद प्राप्त नहीं करता। भारत में राष्ट्रपति संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार निर्वाचित होते हैं।
भारत में राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष हैं, जबकि संसदीय शासन प्रणाली में प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद सरकार के दैनिक संचालन में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
5. उद्देशिका के चार प्रमुख आदर्श
भारतीय संविधान की उद्देशिका चार व्यापक आदर्शों पर विशेष बल देती है—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता।
(क) न्याय
उद्देशिका में तीन प्रकार के न्याय का उल्लेख है:
सामाजिक न्याय: सामाजिक भेदभाव, अस्पृश्यता और अन्यायपूर्ण असमानताओं को समाप्त करने तथा सभी व्यक्तियों को सम्मानजनक जीवन देने का प्रयास।
आर्थिक न्याय: आर्थिक अवसरों में न्याय, शोषण को रोकने और संसाधनों तथा अवसरों की असमानता को कम करने की दिशा में प्रयास।
राजनीतिक न्याय: राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने, मतदान करने और सार्वजनिक जीवन में प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के अवसरों की समानता।
इन तीनों आयामों का उद्देश्य ऐसा समाज विकसित करना है जिसमें व्यक्ति की गरिमा और समान अवसर सुरक्षित रहें।
(ख) स्वतंत्रता
उद्देशिका नागरिकों को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता दिलाने का संकल्प व्यक्त करती है।
विचार की स्वतंत्रता व्यक्ति को अपनी सोच विकसित करने का अवसर देती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता विचारों को व्यक्त करने से संबंधित है। विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता व्यक्ति के अंतःकरण तथा धार्मिक आचरण से जुड़ी है।
इन स्वतंत्रताओं का प्रयोग संविधान और लागू कानूनों के अनुरूप किया जाता है। स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति दूसरों के अधिकारों या सार्वजनिक व्यवस्था की उपेक्षा कर सकता है।
(ग) समानता
उद्देशिका प्रतिष्ठा और अवसर की समता पर बल देती है। समानता का अर्थ केवल कानून के समक्ष समान व्यवहार नहीं, बल्कि व्यक्तियों को अपनी क्षमता विकसित करने के लिए उचित अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास भी है।
भारतीय संविधान में समानता से संबंधित प्रमुख प्रावधान अनुच्छेद 14 से 18 तक दिए गए हैं। इनमें कानून के समक्ष समानता, भेदभाव का निषेध, सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता, अस्पृश्यता का उन्मूलन और उपाधियों का अंत शामिल हैं।
समानता का उद्देश्य सामाजिक और कानूनी व्यवस्था में अनुचित भेदभाव को रोकना है।
(घ) बंधुता
बंधुता का अर्थ आपसी भाईचारा, पारस्परिक सम्मान और साझा राष्ट्रीय भावना है। यह विविधताओं से भरे भारत में नागरिकों के बीच एकता विकसित करने का महत्वपूर्ण आदर्श है।
उद्देशिका बंधुता के माध्यम से दो प्रमुख बातों पर बल देती है:
- व्यक्ति की गरिमा सुनिश्चित करना।
- राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करना।
बंधुता सामाजिक सद्भाव को मजबूत करती है और जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र तथा अन्य आधारों पर विभाजनकारी प्रवृत्तियों को कम करने में सहायक हो सकती है।
6. उद्देशिका और 42वाँ संविधान संशोधन
42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 भारतीय संवैधानिक इतिहास का महत्वपूर्ण संशोधन है। इसके माध्यम से उद्देशिका में तीन महत्वपूर्ण शब्द जोड़े गए:
- समाजवादी
- पंथनिरपेक्ष
- अखंडता
इस संशोधन से पहले उद्देशिका में “सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य” जैसे शब्द थे। संशोधन के बाद इसमें “सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य” का रूप आया तथा राष्ट्र की एकता के साथ अखंडता पर भी स्पष्ट बल दिया गया।
परीक्षा की दृष्टि से यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता—तीनों शब्द 42वें संविधान संशोधन, 1976 से संबंधित हैं।
7. क्या उद्देशिका संविधान का हिस्सा है?
उद्देशिका की संवैधानिक स्थिति को समझने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय महत्वपूर्ण हैं।
बेरुबारी संघ मामला, 1960: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि उद्देशिका संविधान के निर्माताओं के विचारों को समझने में सहायक है, लेकिन उसे संविधान की स्वतंत्र शक्ति प्रदान करने वाले प्रावधान के रूप में नहीं देखा जा सकता।
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973: इस ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि उद्देशिका संविधान का हिस्सा है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि संसद की संशोधन शक्ति संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।
इस निर्णय के बाद उद्देशिका को संविधान के भाग के रूप में समझा जाता है। इसका उपयोग संविधान के प्रावधानों की व्याख्या में सहायता के लिए किया जा सकता है, लेकिन उद्देशिका अपने आप में सामान्यतः स्वतंत्र रूप से न्यायालय में लागू कराए जाने योग्य अधिकार प्रदान नहीं करती।
8. क्या उद्देशिका में संशोधन किया जा सकता है?
उद्देशिका में संशोधन किया जा सकता है, लेकिन संशोधन की शक्ति असीमित नहीं है। संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन कर सकती है, परंतु सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित मूल संरचना सिद्धांत के अधीन रहती है।
42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से उद्देशिका में संशोधन किया गया था। इससे स्पष्ट होता है कि उद्देशिका में परिवर्तन संभव है, लेकिन ऐसा परिवर्तन संविधान की मूल संरचना को नष्ट करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
9. उद्देशिका और मौलिक अधिकारों का संबंध
उद्देशिका और मौलिक अधिकार दोनों भारतीय संविधान के मूल्यों को समझने में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनकी भूमिका समान नहीं है।
उद्देशिका संविधान के व्यापक आदर्शों और उद्देश्यों को व्यक्त करती है। इसके विपरीत, मौलिक अधिकार संविधान के भाग III में दिए गए विशिष्ट अधिकार हैं, जिनके उल्लंघन पर निर्धारित संवैधानिक उपाय उपलब्ध हो सकते हैं।
उदाहरण के लिए, समानता का आदर्श उद्देशिका में व्यक्त है, जबकि कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण का अधिकार अनुच्छेद 14 में दिया गया है। स्वतंत्रता का आदर्श उद्देशिका में है, जबकि कुछ स्वतंत्रताओं का विशिष्ट संरक्षण अनुच्छेद 19 में मिलता है।
इस प्रकार उद्देशिका संवैधानिक मूल्यों को समझने में सहायता करती है और मौलिक अधिकार उन मूल्यों के कई पहलुओं को कानूनी संरक्षण प्रदान करते हैं।
10. उद्देशिका और राज्य के नीति-निदेशक तत्व
राज्य के नीति-निदेशक तत्व संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 36 से 51 तक दिए गए हैं। ये राज्य को सामाजिक और आर्थिक कल्याण से संबंधित नीतियाँ बनाने के लिए मार्गदर्शन देते हैं।
उद्देशिका में सामाजिक और आर्थिक न्याय का संकल्प व्यक्त किया गया है। नीति-निदेशक तत्व इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए राज्य को नीतिगत दिशा प्रदान करते हैं।
नीति-निदेशक तत्व न्यायालय द्वारा सामान्यतः सीधे लागू कराए जाने योग्य नहीं हैं, लेकिन संविधान के अनुसार शासन चलाने में इन्हें मूलभूत माना गया है। मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक तत्वों के बीच सामंजस्य भारतीय संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण पहलू है।
11. उद्देशिका का महत्व
भारतीय संविधान की उद्देशिका का महत्व निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
- यह संविधान के मूल दर्शन और आदर्शों को व्यक्त करती है।
- यह जनता को संविधान की सत्ता का स्रोत बताती है।
- यह भारत की राजनीतिक प्रकृति—संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य—को स्पष्ट करती है।
- यह न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के लक्ष्यों को सामने रखती है।
- यह संविधान के प्रावधानों की व्याख्या में मार्गदर्शन प्रदान करती है।
- यह व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता तथा अखंडता के महत्व को रेखांकित करती है।
- यह भारतीय लोकतंत्र के सामाजिक और नैतिक उद्देश्यों को समझने में सहायता करती है।
12. परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- उद्देशिका का वैचारिक आधार — जवाहरलाल नेहरू का उद्देश्य प्रस्ताव
- उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत — 13 दिसंबर 1946
- उद्देश्य प्रस्ताव स्वीकार — 22 जनवरी 1947
- संविधान अंगीकृत — 26 नवंबर 1949
- संविधान लागू — 26 जनवरी 1950
- उद्देशिका में संशोधन — 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976
- 1976 में जोड़े गए शब्द — समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता
- बेरुबारी संघ मामला — 1960
- केशवानंद भारती मामला — 1973
- उद्देशिका के प्रमुख आदर्श — न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता
- उद्देशिका की शुरुआत — “हम, भारत के लोग”
- गणराज्य का आशय — वंशानुगत राजतंत्र के स्थान पर निर्वाचित राष्ट्राध्यक्ष की व्यवस्था
अभ्यास प्रश्नावली — UPSC/UPPCS स्तर
भारतीय संविधान की उद्देशिका पर 20 महत्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न 1. भारतीय संविधान की उद्देशिका के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।
- उद्देशिका की शुरुआत “हम, भारत के लोग” शब्दों से होती है।
- उद्देशिका संविधान के मूल आदर्शों को व्यक्त करती है।
- उद्देशिका स्वयं प्रत्येक आदर्श के लिए अलग-अलग न्यायालय में लागू कराए जाने योग्य अधिकार प्रदान करती है।
सही उत्तर चुनिए।
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3
सही उत्तर: (A) केवल 1 और 2।
व्याख्या: उद्देशिका संविधान के मूल आदर्शों को व्यक्त करती है और जनता को संवैधानिक सत्ता का स्रोत बताती है। लेकिन यह अपने आप में सामान्यतः स्वतंत्र रूप से न्यायालय में लागू कराए जाने योग्य अधिकार प्रदान नहीं करती।
प्रश्न 2. भारतीय संविधान की उद्देशिका में “समाजवादी” और “पंथनिरपेक्ष” शब्द किस संविधान संशोधन द्वारा जोड़े गए?
(A) प्रथम संविधान संशोधन, 1951
(B) सातवाँ संविधान संशोधन, 1956
(C) 42वाँ संविधान संशोधन, 1976
(D) 44वाँ संविधान संशोधन, 1978
सही उत्तर: (C) 42वाँ संविधान संशोधन, 1976।
व्याख्या: 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा उद्देशिका में “समाजवादी” और “पंथनिरपेक्ष” शब्द जोड़े गए। इसी संशोधन से “अखंडता” शब्द भी जोड़ा गया।
प्रश्न 3. उद्देशिका में वर्णित न्याय के प्रकार कौन-से हैं?
(A) सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक
(B) सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक
(C) आर्थिक, कानूनी और प्रशासनिक
(D) राजनीतिक, धार्मिक और शैक्षिक
सही उत्तर: (B) सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक।
व्याख्या: उद्देशिका सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करने का संकल्प व्यक्त करती है। ये तीनों आयाम न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण हैं।
प्रश्न 4. कथन और कारण पर विचार कीजिए।
कथन (A): उद्देशिका संविधान के प्रावधानों की व्याख्या में सहायता कर सकती है।
कारण (R): उद्देशिका संविधान के मूल दर्शन और उद्देश्यों को व्यक्त करती है।
(A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।
(B) A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं करता।
(C) A सही है, R गलत है।
(D) A गलत है, R सही है।
सही उत्तर: (A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।
व्याख्या: उद्देशिका संविधान के मूल आदर्शों को स्पष्ट करती है। इसलिए संवैधानिक प्रावधानों का अर्थ समझते समय यह व्याख्यात्मक मार्गदर्शन प्रदान कर सकती है।
प्रश्न 5. “गणराज्य” शब्द का सबसे उपयुक्त अर्थ क्या है?
(A) देश में कोई निर्वाचित सरकार नहीं होती।
(B) राष्ट्राध्यक्ष का पद अनिवार्य रूप से वंशानुगत होता है।
(C) राष्ट्राध्यक्ष वंशानुगत राजतंत्र के आधार पर पद प्राप्त नहीं करता।
(D) न्यायपालिका संसद के अधीन होती है।
सही उत्तर: (C) राष्ट्राध्यक्ष वंशानुगत राजतंत्र के आधार पर पद प्राप्त नहीं करता।
व्याख्या: गणराज्य में राष्ट्राध्यक्ष का पद वंशानुगत राजतंत्र पर आधारित नहीं होता। भारत में राष्ट्रपति संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार निर्वाचित होते हैं।
प्रश्न 6. उद्देशिका के ऐतिहासिक विकास के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।
- जवाहरलाल नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
- उद्देश्य प्रस्ताव 13 दिसंबर 1946 को प्रस्तुत किया गया।
- उद्देश्य प्रस्ताव 22 जनवरी 1947 को स्वीकार किया गया।
सही उत्तर चुनिए।
(A) केवल 1
(B) केवल 1 और 2
(C) केवल 2 और 3
(D) 1, 2 और 3
सही उत्तर: (D) 1, 2 और 3।
व्याख्या: जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया था। संविधान सभा ने इसे 22 जनवरी 1947 को स्वीकार किया।
प्रश्न 7. निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही सुमेलित है?
(A) बेरुबारी संघ मामला — 1973
(B) केशवानंद भारती मामला — 1973
(C) 42वाँ संशोधन — 1950
(D) उद्देश्य प्रस्ताव — 26 जनवरी 1950
सही उत्तर: (B) केशवानंद भारती मामला — 1973।
व्याख्या: केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य का ऐतिहासिक निर्णय 1973 में आया। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत को स्थापित किया।
प्रश्न 8. भारतीय पंथनिरपेक्षता के संबंध में सबसे उपयुक्त कथन कौन-सा है?
(A) भारत का एक आधिकारिक राज्य धर्म है।
(B) केवल बहुसंख्यक धर्म के अनुयायियों को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त है।
(C) राज्य धार्मिक आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव नहीं कर सकता और धार्मिक स्वतंत्रता संवैधानिक रूप से संरक्षित है।
(D) धार्मिक स्वतंत्रता का संविधान से कोई संबंध नहीं है।
सही उत्तर: (C) राज्य धार्मिक आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव नहीं कर सकता और धार्मिक स्वतंत्रता संवैधानिक रूप से संरक्षित है।
व्याख्या: भारतीय पंथनिरपेक्षता धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और धर्म के आधार पर भेदभाव न करने के संवैधानिक सिद्धांतों से जुड़ी है।
प्रश्न 9. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।
- उद्देशिका में स्वतंत्रता का उल्लेख है।
- उद्देशिका में प्रतिष्ठा और अवसर की समता का उल्लेख है।
- उद्देशिका में व्यक्ति की गरिमा का कोई उल्लेख नहीं है।
सही उत्तर चुनिए।
(A) केवल 1
(B) केवल 1 और 2
(C) केवल 2 और 3
(D) 1, 2 और 3
सही उत्तर: (B) केवल 1 और 2।
व्याख्या: उद्देशिका विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता तथा प्रतिष्ठा और अवसर की समता का उल्लेख करती है। इसमें व्यक्ति की गरिमा सुनिश्चित करने वाली बंधुता का भी उल्लेख है।
प्रश्न 10. संविधान की उद्देशिका में “हम, भारत के लोग” का प्रमुख संवैधानिक आशय क्या है?
(A) संविधान की सत्ता का स्रोत जनता है।
(B) संविधान केवल संसद द्वारा बनाया गया था।
(C) संविधान का स्रोत केवल न्यायपालिका है।
(D) राज्य की सभी शक्तियाँ विदेशी शासन से आती हैं।
सही उत्तर: (A) संविधान की सत्ता का स्रोत जनता है।
व्याख्या: “हम, भारत के लोग” जनता की संवैधानिक संप्रभुता को व्यक्त करता है। भारतीय शासन की संस्थाएँ संविधान के अधीन कार्य करती हैं।
प्रश्न 11. कथन और कारण पर विचार कीजिए।
कथन (A): भारतीय संविधान की उद्देशिका में संशोधन संभव है।
कारण (R): संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन कर सकती है, लेकिन मूल संरचना सिद्धांत से बंधी है।
(A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।
(B) A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं करता।
(C) A सही है, R गलत है।
(D) A गलत है, R सही है।
सही उत्तर: (A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।
व्याख्या: 42वें संशोधन द्वारा उद्देशिका में परिवर्तन किया गया था। हालांकि, संसद की संशोधन शक्ति मूल संरचना सिद्धांत के अधीन है।
प्रश्न 12. निम्नलिखित में से कौन-सा आदर्श उद्देशिका में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है?
(A) न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता
(B) केवल आर्थिक विकास
(C) केवल प्रशासनिक दक्षता
(D) केवल सैन्य शक्ति
सही उत्तर: (A) न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता।
व्याख्या: ये चार आदर्श भारतीय संविधान की उद्देशिका के मूल स्तंभ हैं। ये नागरिकों की गरिमा और राष्ट्र की एकता के संवैधानिक लक्ष्यों से जुड़े हैं।
प्रश्न 13. उद्देशिका और मौलिक अधिकारों के संबंध में कौन-सा कथन सही है?
(A) उद्देशिका और मौलिक अधिकार पूरी तरह एक ही संवैधानिक प्रावधान हैं।
(B) उद्देशिका व्यापक आदर्श व्यक्त करती है, जबकि मौलिक अधिकार विशिष्ट अधिकारों का संवैधानिक संरक्षण देते हैं।
(C) मौलिक अधिकार केवल उद्देशिका में लिखे गए हैं।
(D) उद्देशिका का संविधान के मूल्यों से कोई संबंध नहीं है।
सही उत्तर: (B) उद्देशिका व्यापक आदर्श व्यक्त करती है, जबकि मौलिक अधिकार विशिष्ट अधिकारों का संवैधानिक संरक्षण देते हैं।
व्याख्या: उद्देशिका संविधान का दर्शन बताती है, जबकि मौलिक अधिकार भाग III में दिए गए विशिष्ट अधिकार हैं। दोनों संवैधानिक व्यवस्था में अलग लेकिन संबंधित भूमिकाएँ निभाते हैं।
प्रश्न 14. गद्यांश पढ़कर प्रश्न का उत्तर दीजिए।
भारतीय संविधान की उद्देशिका न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता पर बल देती है। न्याय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आयामों में व्यक्त होता है। स्वतंत्रता व्यक्ति को विचार और अभिव्यक्ति की गुंजाइश देती है, जबकि समानता प्रतिष्ठा और अवसर से संबंधित है। बंधुता व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता को महत्व देती है।
गद्यांश का केंद्रीय विचार क्या है?
(A) उद्देशिका केवल शासन की संरचना निर्धारित करती है।
(B) उद्देशिका केवल आर्थिक नीतियों का दस्तावेज है।
(C) उद्देशिका संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय जीवन के आदर्शों को व्यक्त करती है।
(D) उद्देशिका मौलिक अधिकारों को समाप्त करती है।
सही उत्तर: (C) उद्देशिका संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय जीवन के आदर्शों को व्यक्त करती है।
व्याख्या: गद्यांश में उद्देशिका के चार प्रमुख आदर्शों और उनके अर्थ का वर्णन है। इसलिए विकल्प (C) सबसे उपयुक्त है।
प्रश्न 15. “सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न” शब्द का अर्थ क्या है?
(A) भारत अपनी घरेलू और विदेश नीति में स्वतंत्र निर्णय ले सकता है।
(B) भारत किसी विदेशी शासन के अधीन है।
(C) भारत को अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भाग लेने का अधिकार नहीं है।
(D) भारत में संविधान सर्वोच्च नहीं है।
सही उत्तर: (A) भारत अपनी घरेलू और विदेश नीति में स्वतंत्र निर्णय ले सकता है।
व्याख्या: सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न का अर्थ है कि भारत आंतरिक और बाहरी मामलों में स्वतंत्र राष्ट्र है और अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय ले सकता है।
प्रश्न 16. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन भारतीय समाजवाद की संवैधानिक समझ के अधिक निकट है?
(A) भारत में सभी निजी उद्यमों का पूर्ण उन्मूलन अनिवार्य है।
(B) भारतीय समाजवाद सामाजिक और आर्थिक न्याय तथा अवसरों की समानता से जुड़ा है।
(C) समाजवाद का उद्देश्य लोकतंत्र को समाप्त करना है।
(D) समाजवाद का समानता से कोई संबंध नहीं है।
सही उत्तर: (B) भारतीय समाजवाद सामाजिक और आर्थिक न्याय तथा अवसरों की समानता से जुड़ा है।
व्याख्या: भारतीय संदर्भ में समाजवाद का संबंध सामाजिक कल्याण, आर्थिक विषमता को कम करने और अवसरों की समानता से है। इसका अर्थ निजी उद्यम के पूर्ण उन्मूलन से नहीं है।
प्रश्न 17. उद्देशिका में “अखंडता” शब्द का विशेष उल्लेख किस संशोधन के माध्यम से किया गया?
(A) 24वाँ संशोधन
(B) 25वाँ संशोधन
(C) 42वाँ संशोधन
(D) 44वाँ संशोधन
सही उत्तर: (C) 42वाँ संशोधन।
व्याख्या: 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ने उद्देशिका में “अखंडता” शब्द जोड़ा। इससे राष्ट्र की एकता के साथ उसकी अखंडता पर भी स्पष्ट बल दिया गया।
प्रश्न 18. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन नीति-निदेशक तत्वों और उद्देशिका के संबंध को सही व्यक्त करता है?
(A) दोनों का कोई संबंध नहीं है।
(B) उद्देशिका सामाजिक और आर्थिक न्याय का आदर्श व्यक्त करती है तथा नीति-निदेशक तत्व राज्य को नीतिगत दिशा देते हैं।
(C) नीति-निदेशक तत्व संविधान के भाग III में हैं।
(D) उद्देशिका सभी नीति-निदेशक तत्वों को समाप्त करती है।
सही उत्तर: (B) उद्देशिका सामाजिक और आर्थिक न्याय का आदर्श व्यक्त करती है तथा नीति-निदेशक तत्व राज्य को नीतिगत दिशा देते हैं।
व्याख्या: उद्देशिका व्यापक संवैधानिक आदर्श व्यक्त करती है। नीति-निदेशक तत्व संविधान के भाग IV में हैं और कल्याणकारी नीतियाँ बनाने में राज्य का मार्गदर्शन करते हैं।
प्रश्न 19. बेरुबारी संघ मामले और केशवानंद भारती मामले के संदर्भ में सही कथन कौन-सा है?
(A) दोनों मामलों का निर्णय 1950 में हुआ।
(B) बेरुबारी संघ मामला 1960 का है और केशवानंद भारती मामला 1973 का है।
(C) दोनों मामलों में उद्देशिका को संविधान से बाहर घोषित किया गया।
(D) केशवानंद भारती मामला 1991 का है।
सही उत्तर: (B) बेरुबारी संघ मामला 1960 का है और केशवानंद भारती मामला 1973 का है।
व्याख्या: बेरुबारी संघ मामले में 1960 में निर्णय आया। केशवानंद भारती मामले में 1973 में सर्वोच्च न्यायालय ने उद्देशिका को संविधान का हिस्सा माना और मूल संरचना सिद्धांत को स्थापित किया।
प्रश्न 20. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।
- उद्देशिका भारत को लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित करती है।
- उद्देशिका न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के आदर्शों को व्यक्त करती है।
- उद्देशिका में 42वें संशोधन द्वारा समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता शब्द जोड़े गए।
- उद्देशिका स्वयं प्रत्येक संवैधानिक आदर्श के लिए स्वतंत्र रूप से न्यायालय में लागू कराए जाने योग्य अधिकार देती है।
सही उत्तर चुनिए।
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 1, 2 और 3
(C) केवल 2, 3 और 4
(D) 1, 2, 3 और 4
सही उत्तर: (B) केवल 1, 2 और 3।
व्याख्या: पहले तीन कथन सही हैं। चौथा कथन गलत है, क्योंकि उद्देशिका अपने आप में सामान्यतः स्वतंत्र रूप से न्यायालय में लागू कराए जाने योग्य अधिकार प्रदान नहीं करती।
अध्याय का निष्कर्ष
भारतीय संविधान की उद्देशिका संविधान के मूल दर्शन और राष्ट्रीय लक्ष्यों का संक्षिप्त परिचय देती है। यह भारत की संप्रभुता, लोकतांत्रिक व्यवस्था, गणराज्य की प्रकृति और न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता के आदर्शों को सामने रखती है। भारतीय संवैधानिक व्यवस्था को समझने के लिए उद्देशिका का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
UPSC और UPPCS की तैयारी करते समय उद्देशिका के मूल पाठ, 42वें संविधान संशोधन, उद्देश्य प्रस्ताव, बेरुबारी संघ मामले और केशवानंद भारती मामले को विशेष रूप से याद रखें।
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