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भारतीय संविधान का ऐतिहासिक विकास: (Bharatiya Samvidhan ka Aitihasik Vikas ) UPSC और UPPCS नोट्स

1. प्रस्तावना

भारतीय संविधान का निर्माण एक लंबी ऐतिहासिक, राजनीतिक और वैचारिक प्रक्रिया का परिणाम है। इसकी वर्तमान संरचना को समझने के लिए ब्रिटिश शासन के दौरान विकसित प्रशासनिक संस्थाओं, संवैधानिक सुधारों, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की मांगों तथा संविधान सभा की भूमिका का अध्ययन आवश्यक है।

भारत का संविधान केवल शासन चलाने का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह नागरिकों के अधिकारों, राज्य की शक्तियों, लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व, सामाजिक न्याय तथा राष्ट्रीय एकता का आधार भी है। औपनिवेशिक काल में बने अनेक कानूनों ने भारत की प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित किया, जबकि स्वतंत्रता आंदोलन ने लोकतंत्र, प्रतिनिधित्व, स्वतंत्रता और समानता जैसे आदर्शों को संवैधानिक स्वरूप देने की दिशा में प्रेरित किया।

2. ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन की पृष्ठभूमि

ईस्ट इंडिया कंपनी को 1600 ई. में इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम से व्यापारिक अधिकार प्राप्त हुए। 1757 के प्लासी युद्ध और 1764 के बक्सर युद्ध के बाद कंपनी की राजनीतिक शक्ति बढ़ी। 1765 में मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय से बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त होने के बाद कंपनी राजस्व वसूली और प्रशासन में प्रत्यक्ष रूप से प्रभावशाली बन गई।

कंपनी के शासन में भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं तथा प्रशासनिक समस्याओं के कारण ब्रिटिश संसद ने उसके कार्यों पर नियंत्रण स्थापित करना शुरू किया। इसी प्रक्रिया से भारत में आधुनिक संवैधानिक विकास की शुरुआत मानी जाती है।

3. रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773

रेग्युलेटिंग एक्ट भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन पर ब्रिटिश संसद का नियंत्रण स्थापित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था।

प्रमुख प्रावधान

  1. बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर जनरल बनाया गया।
  2. बंगाल के प्रथम गवर्नर जनरल के रूप में वॉरेन हेस्टिंग्स नियुक्त हुए।
  3. गवर्नर जनरल की सहायता के लिए चार सदस्यों की परिषद बनाई गई।
  4. बंबई और मद्रास की प्रेसिडेंसियों को कुछ मामलों में बंगाल के अधीन किया गया।
  5. कलकत्ता में 1774 में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई। इसमें एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश थे।
  6. कंपनी के अधिकारियों पर भ्रष्टाचार तथा निजी व्यापार से संबंधित कुछ नियंत्रण लगाए गए।

ऐतिहासिक महत्त्व

इस अधिनियम ने पहली बार ब्रिटिश संसद द्वारा कंपनी के भारतीय प्रशासन को विनियमित करने का स्पष्ट प्रयास किया। हालांकि प्रशासनिक शक्तियों के विभाजन और न्यायालय तथा कार्यपालिका के संबंधों में अस्पष्टता बनी रही।

4. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784

पिट्स इंडिया एक्ट का उद्देश्य भारत में कंपनी के राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यों पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण अधिक प्रभावी बनाना था।

प्रमुख प्रावधान

  1. ब्रिटिश सरकार ने भारत के राजनीतिक मामलों पर अधिक नियंत्रण स्थापित किया।
  2. नियंत्रण बोर्ड (Board of Control) की स्थापना की गई।
  3. कंपनी के व्यापारिक कार्यों और राजनीतिक कार्यों के बीच अंतर स्पष्ट किया गया।
  4. कंपनी का कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स व्यापारिक मामलों में महत्त्वपूर्ण बना रहा, जबकि राजनीतिक मामलों पर नियंत्रण बोर्ड का प्रभाव बढ़ा।

महत्त्व

इस व्यवस्था को द्वैध नियंत्रण प्रणाली कहा जाता है, क्योंकि कंपनी और ब्रिटिश सरकार दोनों की भूमिका बनी रही। कंपनी का शासन जारी रहा, लेकिन उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता सीमित हो गई।

5. चार्टर एक्ट, 1813

चार्टर एक्ट, 1813 ने भारत के साथ कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को काफी हद तक समाप्त किया।

प्रमुख प्रावधान

  1. भारत के साथ व्यापार में कंपनी का एकाधिकार समाप्त किया गया, लेकिन चाय के व्यापार तथा चीन के साथ व्यापार पर उसका एकाधिकार बना रहा।
  2. ईसाई मिशनरियों को भारत में आने और धार्मिक गतिविधियाँ संचालित करने की अनुमति मिली।
  3. भारतीय शिक्षा के प्रोत्साहन के लिए प्रतिवर्ष एक लाख रुपये खर्च करने का प्रावधान किया गया।
  4. भारत में ब्रिटिश शासन की संप्रभुता के दावे को अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया।

महत्त्व

इस अधिनियम ने भारत में ब्रिटिश आर्थिक नीति, शिक्षा तथा मिशनरी गतिविधियों के विस्तार को प्रभावित किया।

6. चार्टर एक्ट, 1833

चार्टर एक्ट, 1833 कंपनी शासन के प्रशासनिक केंद्रीकरण की दिशा में महत्त्वपूर्ण था।

प्रमुख प्रावधान

  1. बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल बनाया गया।
  2. लॉर्ड विलियम बेंटिंक भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बने।
  3. कंपनी की व्यापारिक गतिविधियाँ समाप्त कर दी गईं और वह मुख्यतः प्रशासनिक संस्था बन गई।
  4. कानून निर्माण की शक्ति का अधिक केंद्रीकरण किया गया।
  5. गवर्नर जनरल की परिषद में विधायी कार्यों के लिए एक सदस्य जोड़ने का प्रावधान किया गया।
  6. भारतीयों को सरकारी सेवाओं में अवसर देने की दिशा में सिद्धांततः प्रावधान किया गया, यद्यपि व्यवहार में व्यापक समानता स्थापित नहीं हुई।

महत्त्व

इस अधिनियम ने भारत में एक केंद्रीकृत विधायी व्यवस्था विकसित करने में सहायता की। इसे कंपनी के व्यापारिक स्वरूप के अंत और प्रशासनिक स्वरूप की मजबूती से भी जोड़ा जाता है।

7. चार्टर एक्ट, 1853

चार्टर एक्ट, 1853 कंपनी शासन के अंतिम चरण का महत्त्वपूर्ण अधिनियम था।

प्रमुख प्रावधान

  1. गवर्नर जनरल की परिषद के विधायी और कार्यकारी कार्यों में अधिक स्पष्ट अंतर किया गया।
  2. विधायी कार्यों के लिए परिषद का विस्तार किया गया।
  3. सिविल सेवाओं में प्रतियोगी परीक्षा की दिशा में मार्ग प्रशस्त हुआ।
  4. कंपनी के शासन को निश्चित अवधि के लिए नवीनीकृत करने के बजाय ब्रिटिश संसद के नियंत्रण में जारी रखा गया।

महत्त्व

यह अधिनियम भारत में आधुनिक विधायी परिषदों और प्रतियोगी सिविल सेवा व्यवस्था के विकास की दिशा में महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

8. भारत शासन अधिनियम, 1858

1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत का शासन अपने हाथ में ले लिया।

प्रमुख प्रावधान

  1. कंपनी का शासन समाप्त हुआ।
  2. भारत का प्रशासन ब्रिटिश क्राउन के अधीन चला गया।
  3. भारत सचिव (Secretary of State for India) का पद बनाया गया।
  4. भारत सचिव की सहायता के लिए 15 सदस्यों की परिषद का प्रावधान किया गया।
  5. गवर्नर जनरल को वायसराय भी कहा जाने लगा। लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वायसराय बने।
  6. महारानी विक्टोरिया की 1858 की घोषणा में भारतीय रियासतों के प्रति नीति, धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने और प्रशासनिक निष्पक्षता जैसे आश्वासन दिए गए।

महत्त्व

इस अधिनियम ने कंपनी शासन का अंत कर भारत में प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन की स्थापना की। इसके बाद भारतीय प्रशासन का नियंत्रण ब्रिटिश सरकार और संसद के माध्यम से संचालित होने लगा।

9. भारतीय परिषद अधिनियम, 1861

इस अधिनियम ने विधायी परिषदों में भारतीयों को सीमित रूप से शामिल करने की संभावना खोली।

प्रमुख प्रावधान

  1. गवर्नर जनरल की विधायी परिषद का विस्तार किया गया।
  2. विधायी कार्यों के लिए अतिरिक्त सदस्यों को नामित करने का प्रावधान हुआ।
  3. बंबई और मद्रास को विधायी शक्तियाँ वापस देकर विकेंद्रीकरण की दिशा में कदम उठाया गया।
  4. पोर्टफोलियो प्रणाली को मान्यता मिली, जिसके अंतर्गत अलग-अलग विभाग अलग-अलग सदस्यों को सौंपे जा सकते थे।
  5. आपात परिस्थितियों में अध्यादेश जारी करने की शक्ति का प्रावधान किया गया।

महत्त्व

यह अधिनियम सीमित विधायी विकेंद्रीकरण और भारतीयों की नाममात्र भागीदारी की दिशा में महत्त्वपूर्ण था। फिर भी वास्तविक सत्ता ब्रिटिश अधिकारियों के हाथ में बनी रही।

10. भारतीय परिषद अधिनियम, 1892

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रारंभिक मांगों और राजनीतिक जागरूकता के बीच यह अधिनियम पारित हुआ।

प्रमुख प्रावधान

  1. केंद्रीय और प्रांतीय विधायी परिषदों का विस्तार किया गया।
  2. परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या बढ़ाने का प्रावधान हुआ।
  3. सदस्यों को बजट पर चर्चा करने की सीमित अनुमति मिली।
  4. सदस्यों को कुछ विषयों पर प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया, लेकिन पूरक प्रश्नों तथा शासन को बाध्य करने वाली शक्तियों पर सीमाएँ थीं।
  5. प्रतिनिधियों के चयन में अप्रत्यक्ष निर्वाचन जैसी प्रक्रिया का सीमित विकास हुआ।

महत्त्व

इस अधिनियम ने प्रतिनिधित्व की दिशा में सीमित प्रगति की, लेकिन परिषदें उत्तरदायी सरकार का रूप नहीं ले सकीं।

11. भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 — मॉर्ले-मिंटो सुधार

इस अधिनियम का उद्देश्य विधायी परिषदों का विस्तार करना और कुछ भारतीयों को शासन में अधिक भागीदारी देना था।

प्रमुख प्रावधान

  1. केंद्रीय और प्रांतीय विधायी परिषदों का विस्तार किया गया।
  2. सदस्यों को बजट पर चर्चा, प्रस्ताव प्रस्तुत करने तथा प्रश्न पूछने के कुछ अधिक अवसर मिले।
  3. मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था की गई।
  4. सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा वायसराय की कार्यकारी परिषद में शामिल होने वाले पहले भारतीय बने।

महत्त्व और आलोचना

पृथक निर्वाचन मंडल ने धार्मिक आधार पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व को संस्थागत स्वरूप दिया। आलोचकों के अनुसार इससे सामुदायिक राजनीति को प्रोत्साहन मिला। हालांकि अधिनियम ने सीमित राजनीतिक भागीदारी का विस्तार भी किया।

12. भारत शासन अधिनियम, 1919 — मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार

इस अधिनियम का उद्देश्य भारत में उत्तरदायी शासन की दिशा में क्रमिक प्रगति करना बताया गया।

प्रमुख प्रावधान

  1. प्रांतों में द्वैध शासन (Dyarchy) लागू किया गया।
  2. प्रांतीय विषयों को आरक्षित और हस्तांतरित विषयों में बाँटा गया।
  3. आरक्षित विषयों का नियंत्रण गवर्नर और उसकी कार्यकारी परिषद के पास रहा।
  4. हस्तांतरित विषय भारतीय मंत्रियों को सौंपे गए, जो विधायिका के प्रति सीमित रूप से उत्तरदायी थे।
  5. केंद्र में द्विसदनीय विधायिका स्थापित की गई।
  6. केंद्र और प्रांतों के विषयों में विभाजन की दिशा में कदम उठाया गया।
  7. पृथक निर्वाचन मंडल का विस्तार अन्य कुछ समुदायों तक किया गया।
  8. लोक सेवा आयोग की स्थापना की दिशा में प्रावधान किया गया; केंद्रीय लोक सेवा आयोग 1926 में स्थापित हुआ।

महत्त्व और सीमाएँ

इस अधिनियम ने प्रांतीय स्तर पर सीमित उत्तरदायित्व तथा केंद्र में द्विसदनीय विधायिका को प्रोत्साहित किया। लेकिन वास्तविक प्रशासनिक नियंत्रण गवर्नर और ब्रिटिश अधिकारियों के पास रहा। द्वैध शासन जटिल और अप्रभावी सिद्ध हुआ।

13. भारत शासन अधिनियम, 1935

भारत शासन अधिनियम, 1935 ब्रिटिश शासनकाल का सबसे विस्तृत संवैधानिक अधिनियम था। स्वतंत्र भारत के संविधान के कई प्रशासनिक प्रावधानों पर इसका प्रभाव माना जाता है।

प्रमुख प्रावधान

  1. अखिल भारतीय संघ की स्थापना का प्रस्ताव किया गया, जिसमें ब्रिटिश भारतीय प्रांतों और रियासतों को शामिल किया जाना था। रियासतों के पर्याप्त रूप से शामिल न होने के कारण संघीय योजना लागू नहीं हो सकी।
  2. प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता लागू की गई।
  3. केंद्र में द्वैध शासन का प्रावधान किया गया, लेकिन यह लागू नहीं हुआ।
  4. संघीय, प्रांतीय और समवर्ती सूचियों के माध्यम से विधायी शक्तियों के विभाजन की व्यवस्था की गई।
  5. कुछ प्रांतों में द्विसदनीय विधायिका का प्रावधान किया गया।
  6. संघीय न्यायालय की स्थापना का प्रावधान हुआ, जो 1937 में स्थापित हुआ।
  7. भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना 1935 में हुई; इसका संस्थागत आधार अलग कानून, भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 था।
  8. संघीय लोक सेवा आयोग, प्रांतीय लोक सेवा आयोग और संयुक्त लोक सेवा आयोगों की व्यवस्था का प्रावधान किया गया।
  9. गवर्नरों तथा गवर्नर जनरल को व्यापक विवेकाधीन और विशेष शक्तियाँ दी गईं।

महत्त्व

इस अधिनियम ने प्रांतीय स्वायत्तता, संघीय ढाँचे, विधायी सूचियों और प्रशासनिक संस्थाओं के विकास को प्रभावित किया। स्वतंत्र भारत में संघवाद और प्रशासनिक संरचना के कुछ पहलुओं को समझने के लिए इसका अध्ययन आवश्यक है।

सीमाएँ

  1. केंद्र में उत्तरदायी सरकार स्थापित नहीं हुई।
  2. गवर्नर जनरल और गवर्नरों के पास व्यापक विशेष शक्तियाँ थीं।
  3. मताधिकार सीमित था।
  4. प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ अस्तित्व में नहीं आया।
  5. ब्रिटिश संसद का सर्वोच्च नियंत्रण बना रहा।

14. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ने ब्रिटिश शासन के अंत और भारत तथा पाकिस्तान के स्वतंत्र डोमिनियन बनने का कानूनी आधार प्रदान किया।

प्रमुख प्रावधान

  1. 15 अगस्त 1947 से भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र डोमिनियन बने।
  2. ब्रिटिश सरकार की भारत पर संप्रभुता समाप्त हुई।
  3. ब्रिटिश भारत का विभाजन किया गया।
  4. दोनों डोमिनियन की संविधान सभाओं को अपने-अपने संविधान बनाने तथा विधायी कार्य करने की शक्ति मिली।
  5. ब्रिटिश सम्राट की भारतीय रियासतों पर सर्वोच्चता समाप्त हुई।
  6. भारत के गवर्नर जनरल और पाकिस्तान के गवर्नर जनरल की व्यवस्था की गई।

महत्त्व

इस अधिनियम ने औपनिवेशिक शासन के अंत और संविधान निर्माण की प्रक्रिया को निर्णायक आधार दिया। स्वतंत्रता के बाद भारत ने संविधान सभा के माध्यम से अपना संविधान तैयार किया।

15. संविधान सभा का गठन

संविधान सभा के गठन का आधार 1946 की कैबिनेट मिशन योजना थी। इसके सदस्य प्रत्यक्ष सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से नहीं चुने गए थे; प्रांतीय विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों ने अप्रत्यक्ष चुनाव द्वारा प्रतिनिधियों का चयन किया। रियासतों के प्रतिनिधियों के लिए नामांकन की व्यवस्था थी।

प्रमुख तथ्य

  • संविधान सभा की पहली बैठक: 9 दिसंबर 1946।
  • अस्थायी अध्यक्ष: डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा।
  • स्थायी अध्यक्ष: डॉ. राजेंद्र प्रसाद, 11 दिसंबर 1946 को निर्वाचित।
  • उद्देश्य प्रस्ताव: जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को प्रस्तुत किया।
  • उद्देश्य प्रस्ताव स्वीकार: 22 जनवरी 1947।
  • प्रारूप समिति का गठन: 29 अगस्त 1947।
  • प्रारूप समिति के अध्यक्ष: डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर।
  • संविधान अंगीकृत: 26 नवंबर 1949।
  • संविधान पर हस्ताक्षर: 24 जनवरी 1950।
  • संविधान लागू: 26 जनवरी 1950।

विभाजन के बाद संविधान सभा की सदस्य संख्या 299 रह गई थी। संविधान निर्माण में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन लगे।

16. प्रमुख समितियाँ और उनके अध्यक्ष

  1. प्रारूप समिति — डॉ. बी. आर. आंबेडकर।
  2. संघ शक्ति समिति — जवाहरलाल नेहरू।
  3. संघ संविधान समिति — जवाहरलाल नेहरू।
  4. प्रांतीय संविधान समिति — सरदार वल्लभभाई पटेल।
  5. मौलिक अधिकार, अल्पसंख्यक तथा जनजातीय और बहिष्कृत क्षेत्रों से संबंधित सलाहकार समिति — सरदार वल्लभभाई पटेल।
  6. संचालन समिति — डॉ. राजेंद्र प्रसाद।
  7. नियम प्रक्रिया समिति — डॉ. राजेंद्र प्रसाद।
  8. वित्त और कर्मचारी समिति — डॉ. राजेंद्र प्रसाद।

समितियों ने विभिन्न संवैधानिक विषयों पर विचार किया। प्रारूप समिति ने पूर्ववर्ती समितियों की रिपोर्टों और अन्य संवैधानिक स्रोतों के आधार पर संविधान का प्रारूप तैयार करने में केंद्रीय भूमिका निभाई।

17. भारतीय संविधान पर प्रमुख संवैधानिक स्रोतों का प्रभाव

भारतीय संविधान निर्माताओं ने विभिन्न देशों की संवैधानिक व्यवस्थाओं और भारत के प्रशासनिक अनुभवों का अध्ययन किया। किसी प्रावधान को अपनाने का अर्थ उसकी हूबहू नकल करना नहीं था; भारतीय परिस्थितियों के अनुसार उसमें संशोधन और समायोजन किया गया।

  • ब्रिटेन: संसदीय शासन प्रणाली, मंत्रिमंडलीय उत्तरदायित्व और विधि का शासन।
  • अमेरिका: मौलिक अधिकार, न्यायिक पुनरावलोकन और स्वतंत्र न्यायपालिका से संबंधित विचार।
  • आयरलैंड: राज्य के नीति-निदेशक तत्वों की प्रेरणा।
  • कनाडा: सशक्त केंद्र वाली संघीय व्यवस्था से संबंधित विशेषताएँ।
  • ऑस्ट्रेलिया: समवर्ती सूची और कुछ विधायी प्रक्रियाओं से संबंधित प्रेरणा।
  • जर्मनी के वाइमर संविधान: आपातकालीन प्रावधानों के कुछ पहलू।
  • सोवियत संघ: मौलिक कर्तव्यों के संबंध में वैचारिक प्रेरणा, जिन्हें बाद में 42वें संविधान संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया।
  • दक्षिण अफ्रीका: संविधान संशोधन की प्रक्रिया और राज्यसभा के सदस्यों के निर्वाचन से संबंधित कुछ पहलू।
  • भारत शासन अधिनियम, 1935: प्रशासनिक ढाँचे, संघीय विशेषताओं और लोक सेवा आयोगों से संबंधित कई प्रावधानों का आधार।

18. ऐतिहासिक विकास का समग्र मूल्यांकन

भारतीय संविधान का ऐतिहासिक विकास तीन प्रमुख प्रक्रियाओं से प्रभावित हुआ। पहली, ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासनिक केंद्रीकरण और विधायी संस्थाओं का क्रमिक विकास। दूसरी, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के माध्यम से प्रतिनिधित्व, नागरिक स्वतंत्रता और उत्तरदायी शासन की मांग। तीसरी, संविधान सभा द्वारा इन अनुभवों को लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक व्यवस्था में रूपांतरित करना।

औपनिवेशिक कानूनों ने प्रशासनिक संस्थाएँ विकसित कीं, लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य लंबे समय तक ब्रिटिश शासन को बनाए रखना था। इसके विपरीत, स्वतंत्र भारत का संविधान जनता की संप्रभुता, समानता, स्वतंत्रता, न्याय और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व पर आधारित है।

इसलिए भारतीय संविधान को समझने के लिए केवल अधिनियमों की तिथियाँ याद करना पर्याप्त नहीं है। यह भी समझना चाहिए कि प्रत्येक सुधार ने सत्ता के केंद्रीकरण, प्रतिनिधित्व, निर्वाचन, न्यायपालिका और उत्तरदायी शासन को किस प्रकार प्रभावित किया।


अभ्यास प्रश्न — UPSC/UPPCS स्तर

कुल 20 कठिन बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773 के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।

  1. इसने बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर जनरल बनाया।
  2. इसने कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना का प्रावधान किया।
  3. इसने ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार पूरी तरह समाप्त कर दिया।

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3

प्रश्न 2. निम्नलिखित का सही कालानुक्रमिक क्रम चुनिए।

  1. पिट्स इंडिया एक्ट
  2. चार्टर एक्ट, 1833
  3. भारतीय परिषद अधिनियम, 1861
  4. भारत शासन अधिनियम, 1858

(A) 1–2–4–3
(B) 2–1–3–4
(C) 1–4–2–3
(D) 4–1–2–3

प्रश्न 3. मिलान कीजिए।

सूची-I: अधिनियमसूची-II: प्रमुख विशेषता
A. 17841. प्रांतीय स्वायत्तता
B. 18132. नियंत्रण बोर्ड
C. 19093. व्यापारिक एकाधिकार का आंशिक अंत
D. 19354. मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन

सही कूट चुनिए।

(A) A-2, B-3, C-4, D-1
(B) A-3, B-2, C-1, D-4
(C) A-2, B-4, C-3, D-1
(D) A-1, B-3, C-4, D-2

प्रश्न 4. चार्टर एक्ट, 1833 के संबंध में कौन-सा कथन सही है?

(A) इसने भारत में कंपनी के व्यापारिक कार्यों को समाप्त कर दिया।
(B) इसने पृथक निर्वाचन मंडल की शुरुआत की।
(C) इसने प्रांतों में द्वैध शासन लागू किया।
(D) इसने भारत को स्वतंत्र डोमिनियन घोषित किया।

प्रश्न 5. कथन–कारण प्रश्न

कथन (A): भारत शासन अधिनियम, 1858 के बाद भारत का शासन ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया।

कारण (R): 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया।

(A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।
(B) A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
(C) A सही है, R गलत है।
(D) A गलत है, R सही है।

प्रश्न 6. भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।

  1. सदस्यों को बजट पर चर्चा का सीमित अधिकार मिला।
  2. सदस्यों को शासन के प्रत्येक निर्णय पर बाध्यकारी मतदान का अधिकार मिला।
  3. अप्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व की प्रवृत्ति विकसित हुई।

(A) केवल 1
(B) केवल 1 और 3
(C) केवल 2 और 3
(D) 1, 2 और 3

प्रश्न 7. मॉर्ले-मिंटो सुधार, 1909 की सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक विशेषता क्या थी?

(A) सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार
(B) पूर्ण प्रांतीय स्वायत्तता
(C) मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल
(D) संविधान सभा का गठन

प्रश्न 8. मिलान कीजिए।

सूची-Iसूची-II
A. 1919 का अधिनियम1. प्रांतीय स्वायत्तता
B. 1935 का अधिनियम2. प्रांतों में द्वैध शासन
C. 1947 का अधिनियम3. भारत और पाकिस्तान का स्वतंत्र डोमिनियन बनना
D. 1858 का अधिनियम4. क्राउन का प्रत्यक्ष शासन

(A) A-2, B-1, C-3, D-4
(B) A-1, B-2, C-4, D-3
(C) A-3, B-1, C-2, D-4
(D) A-2, B-4, C-1, D-3

प्रश्न 9. भारत शासन अधिनियम, 1919 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।

  1. प्रांतों में विषयों को आरक्षित और हस्तांतरित श्रेणियों में विभाजित किया गया।
  2. केंद्र में द्विसदनीय विधायिका स्थापित की गई।
  3. इस अधिनियम ने भारत में पूर्ण उत्तरदायी सरकार स्थापित कर दी।

(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3

प्रश्न 10. भारत शासन अधिनियम, 1935 के बारे में कौन-सा कथन गलत है?

(A) इसने प्रांतीय स्वायत्तता का प्रावधान किया।
(B) इसने संघीय, प्रांतीय और समवर्ती सूचियों की व्यवस्था की।
(C) इसकी प्रस्तावित अखिल भारतीय संघीय योजना पूरी तरह लागू हो गई।
(D) इसने संघीय न्यायालय की स्थापना का प्रावधान किया।

प्रश्न 11. गद्यांश आधारित प्रश्न

एक औपनिवेशिक अधिनियम ने प्रांतीय स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका बढ़ाई, लेकिन गवर्नरों को विशेष शक्तियाँ भी प्रदान कीं। प्रशासनिक विषयों का विभाजन किया गया और केंद्र में उत्तरदायी शासन की सीमाएँ बनी रहीं। यह अधिनियम ब्रिटिश शासनकाल की संघीय योजना से भी जुड़ा था।

उपर्युक्त गद्यांश मुख्यतः किस अधिनियम का वर्णन करता है?

(A) रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773
(B) भारत शासन अधिनियम, 1858
(C) भारत शासन अधिनियम, 1935
(D) भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947

प्रश्न 12. संविधान सभा के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।

  1. इसकी पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई।
  2. डॉ. राजेंद्र प्रसाद इसके स्थायी अध्यक्ष चुने गए।
  3. संविधान सभा के सभी सदस्य प्रत्यक्ष सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से चुने गए थे।

(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3

प्रश्न 13. मिलान कीजिए।

सूची-I: समितिसूची-II: अध्यक्ष
A. प्रारूप समिति1. जवाहरलाल नेहरू
B. प्रांतीय संविधान समिति2. डॉ. बी. आर. आंबेडकर
C. संघ शक्ति समिति3. सरदार वल्लभभाई पटेल
D. संचालन समिति4. डॉ. राजेंद्र प्रसाद

(A) A-2, B-3, C-1, D-4
(B) A-1, B-2, C-4, D-3
(C) A-2, B-1, C-3, D-4
(D) A-4, B-3, C-1, D-2

प्रश्न 14. उद्देश्य प्रस्ताव के संबंध में सही विकल्प चुनिए।

(A) इसे डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने 1949 में प्रस्तुत किया।
(B) इसे जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को प्रस्तुत किया।
(C) इसे 26 जनवरी 1950 को स्वीकार किया गया।
(D) यह भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 का हिस्सा था।

प्रश्न 15. निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?

(A) ब्रिटेन — संसदीय शासन प्रणाली
(B) आयरलैंड — राज्य के नीति-निदेशक तत्व
(C) कनाडा — सशक्त केंद्र वाली संघीय व्यवस्था से संबंधित प्रेरणा
(D) सोवियत संघ — मूल संविधान में मौलिक कर्तव्य

प्रश्न 16. कथन–कारण प्रश्न

कथन (A): भारत शासन अधिनियम, 1935 भारतीय संविधान के विकास को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है।

कारण (R): इस अधिनियम में प्रांतीय स्वायत्तता, विधायी सूचियों तथा प्रशासनिक संस्थाओं से संबंधित प्रावधान थे, जिनका स्वतंत्र भारत की संवैधानिक संरचना से ऐतिहासिक संबंध रहा।

(A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।
(B) A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
(C) A सही है, R गलत है।
(D) A गलत है, R सही है।

प्रश्न 17. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के संबंध में कौन-सा कथन सही है?

(A) इसने भारत में कंपनी शासन को पहली बार स्थापित किया।
(B) इसने भारत और पाकिस्तान को स्वतंत्र डोमिनियन का दर्जा दिया।
(C) इसने संविधान सभा को समाप्त कर दिया।
(D) इसने भारत में पृथक निर्वाचन मंडल की शुरुआत की।

प्रश्न 18. गद्यांश आधारित प्रश्न

एक संवैधानिक सुधार ने केंद्र में दो सदनों वाली विधायिका स्थापित की, जबकि प्रांतीय शासन में विषयों को दो श्रेणियों में बाँटा गया। कुछ विषय गवर्नर और उसकी कार्यकारी परिषद के नियंत्रण में रहे, जबकि अन्य विषय भारतीय मंत्रियों को सौंपे गए।

इस व्यवस्था की पहचान कीजिए।

(A) 1909 के सुधार
(B) 1919 के सुधार
(C) 1935 के सुधार
(D) 1947 के अधिनियम

प्रश्न 19. निम्नलिखित घटनाओं का सही कालानुक्रमिक क्रम चुनिए।

  1. प्रारूप समिति का गठन
  2. संविधान का अंगीकरण
  3. संविधान सभा की पहली बैठक
  4. संविधान लागू होना

(A) 3–1–2–4
(B) 1–3–4–2
(C) 3–2–1–4
(D) 1–2–3–4

प्रश्न 20. समेकित विश्लेषणात्मक प्रश्न

भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।

  1. ब्रिटिश काल के संवैधानिक सुधारों में प्रशासनिक केंद्रीकरण और सीमित प्रतिनिधित्व दोनों प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं।
  2. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने उत्तरदायी शासन और नागरिक स्वतंत्रताओं की मांग को बल दिया।
  3. स्वतंत्र भारत का संविधान औपनिवेशिक शासन की सभी संस्थाओं और उद्देश्यों को बिना किसी परिवर्तन के जारी रखने के लिए बनाया गया था।

सही उत्तर चुनिए।

(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3


उत्तरमाला एवं संक्षिप्त व्याख्या

  1. (A) — रेग्युलेटिंग एक्ट ने गवर्नर जनरल और सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था की; कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार बाद के अधिनियमों से सीमित हुआ।
  2. (A) — 1784, 1833, 1858 और 1861।
  3. (A) — 1784 में नियंत्रण बोर्ड, 1813 में व्यापारिक एकाधिकार का आंशिक अंत, 1909 में पृथक निर्वाचन और 1935 में प्रांतीय स्वायत्तता।
  4. (A) — चार्टर एक्ट, 1833 ने कंपनी के व्यापारिक कार्य समाप्त किए।
  5. (A) — 1857 के विद्रोह के बाद कंपनी शासन समाप्त हुआ और शासन क्राउन के अधीन आया।
  6. (B) — बजट चर्चा और सीमित प्रतिनिधित्व का विस्तार हुआ; बाध्यकारी मतदान का अधिकार नहीं मिला।
  7. (C) — मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था की।
  8. (A) — 1919 में प्रांतीय द्वैध शासन, 1935 में प्रांतीय स्वायत्तता, 1947 में स्वतंत्र डोमिनियन और 1858 में क्राउन का शासन।
  9. (A) — 1919 के अधिनियम ने द्वैध शासन और केंद्र में द्विसदनीय विधायिका की व्यवस्था की, लेकिन पूर्ण उत्तरदायी सरकार नहीं दी।
  10. (C) — अखिल भारतीय संघीय योजना लागू नहीं हुई।
  11. (C) — प्रांतीय स्वायत्तता और गवर्नरों की विशेष शक्तियाँ 1935 के अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ थीं।
  12. (A) — संविधान सभा का गठन अप्रत्यक्ष निर्वाचन तथा रियासतों के प्रतिनिधियों की अलग व्यवस्था के आधार पर हुआ था।
  13. (A) — प्रारूप समिति: आंबेडकर; प्रांतीय संविधान समिति: पटेल; संघ शक्ति समिति: नेहरू; संचालन समिति: राजेंद्र प्रसाद।
  14. (B) — उद्देश्य प्रस्ताव ने संविधान के मूल आदर्शों की दिशा निर्धारित की।
  15. (D) — मौलिक कर्तव्य मूल संविधान में नहीं थे; इन्हें 42वें संविधान संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया।
  16. (A) — अधिनियम के प्रशासनिक और संघीय प्रावधानों का स्वतंत्र भारत की संवैधानिक संरचना से ऐतिहासिक संबंध है।
  17. (B) — अधिनियम ने भारत और पाकिस्तान के स्वतंत्र डोमिनियन बनने का कानूनी आधार दिया।
  18. (B) — यह 1919 के अधिनियम के अंतर्गत प्रांतीय द्वैध शासन का वर्णन है।
  19. (A) — पहली बैठक 1946, प्रारूप समिति 1947, अंगीकरण 1949 और लागू होना 1950।
  20. (A) — स्वतंत्र भारत का संविधान लोकतांत्रिक मूल्यों और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्शों पर आधारित था; औपनिवेशिक संस्थाओं को बिना परिवर्तन जारी रखने का उद्देश्य नहीं था।

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